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पहली बार विधायक से नेता विपक्ष तक पहुंचे रितब्रता, ममता बनर्जी के खिलाफ कैसे खड़ा हुआ 60 विधायकों का खेमा?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर बड़ा संकट गहराता दिख रहा है। रितब्रता बनर्जी को नेता विपक्ष बनाए जाने और 60 विधायकों के समर्थन के दावे ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 04 Jun 2026 11:50:44

पहली बार विधायक से नेता विपक्ष तक पहुंचे रितब्रता, ममता बनर्जी के खिलाफ कैसे खड़ा हुआ 60 विधायकों का खेमा?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर उठी अंदरूनी हलचल अब बड़े राजनीतिक संकट का रूप लेती दिख रही है। पहली बार विधायक बने रितब्रता बनर्जी के नेतृत्व में सामने आए बागी गुट ने खुद को असली टीएमसी धड़ा बताते हुए पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को चुनौती दे दी है। हालात तब और अधिक गंभीर हो गए जब विधानसभा स्पीकर द्वारा रितब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता दिए जाने की बात सामने आई। बागी खेमे का दावा है कि उन्हें कुल 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जिससे राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच पार्टी से निष्कासित नेता संदीपन साहा ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष के लिए निर्धारित कार्यालय कक्ष को आधिकारिक रूप से आवंटित कर दिया गया है, जिससे विवाद और गहरा गया है।

कैसे बने 60 विधायकों के समर्थन का आधार?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि पहली बार विधायक बने रितब्रता बनर्जी ने आखिर किस तरह ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC में इतना बड़ा बागी समूह तैयार कर लिया। वह भी उस समय जब विधानसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह समझना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है कि कुछ ही हफ्तों में पार्टी के भीतर असंतोष इतनी तेजी से कैसे फैल गया। यह ध्यान देने योग्य है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने केवल एक या दो चुनाव नहीं, बल्कि लगातार तीन कार्यकाल तक पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाली है, जिससे इस तरह का आंतरिक विभाजन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

फर्जी हस्ताक्षर के आरोप से बढ़ा विवाद

तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे इस टकराव की जड़ उस गंभीर आरोप में बताई जा रही है, जिसमें दावा किया गया है कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित करने वाले पत्र पर पार्टी के ही विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। यह मुद्दा तब सार्वजनिक हुआ जब विधायकों संदीपान साहा और रितब्रता बनर्जी ने इस मामले में विधानसभा सचिवालय में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया और पार्टी के भीतर अविश्वास की स्थिति और गहरी होती चली गई।

60 विधायकों की अनुपस्थिति और बढ़ती अटकलें

शिकायत के बाद ही स्थिति तेजी से बदलती दिखाई दी। कुछ ही घंटों के भीतर TMC ने दोनों विधायकों को दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसी बीच यह भी चर्चा तेज हो गई कि रितब्रता बनर्जी पार्टी के भीतर किसी बड़े बदलाव की तैयारी कर रहे हैं और खुद को असली टीएमसी के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं। पिछले सप्ताह यह स्थिति और स्पष्ट हुई जब पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 60 विधायक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में शामिल नहीं हुए। इसके अलावा मंगलवार को हुए एक सार्वजनिक कार्यक्रम में, जो चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी का पहला बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन था, वहां भी केवल 8 विधायक और 6 सांसद ही मौजूद दिखाई दिए, जिससे संगठन की एकजुटता पर सवाल उठने लगे।

क्या तृणमूल कांग्रेस में दरार गहराएगी?

पार्टी के भीतर असंतोष और मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं, जिससे तृणमूल कांग्रेस के भविष्य को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसी बीच बागी गुट ने बुधवार को एक पत्र पेश किया, जिसमें दावा किया गया कि 60 विधायकों ने रितब्रता बनर्जी को नेता विपक्ष बनाने के समर्थन में हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि इसी गुट ने यह भी स्पष्ट किया कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं और न ही किसी नई पार्टी के गठन की योजना बना रहे हैं। बागी समूह से जुड़े एक विधायक ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी को तोड़ना नहीं है, बल्कि वे तृणमूल कांग्रेस के झंडे के नीचे रहकर ही काम करना चाहते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संकट के बावजूद संगठन के भीतर पूरी तरह विभाजन की स्थिति अभी औपचारिक रूप से नहीं बनी है।

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