
राजस्थान में एक ओर सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर होती जा रही है और मरम्मत के लिए बजट की कमी बताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार अपने मंत्रियों के लिए करीब 55 लाख रुपये कीमत की लग्जरी फॉर्च्यूनर गाड़ियां खरीदने जा रही है। इस फैसले को लेकर सियासत तेज हो गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए इस कदम को गैरजरूरी बताया है।
सरकार की दलील है कि मंत्रियों को लगातार दौरे करने पड़ते हैं और पुरानी गाड़ियों के बीच रास्ते में खराब हो जाने का खतरा बना रहता है। ऐसे में नई फॉर्च्यूनर खरीदने का फैसला गलत नहीं है। हालांकि कांग्रेस इस तर्क से सहमत नहीं दिख रही और इसे जनता के पैसों की बर्बादी करार दे रही है।
कई मंत्री निजी फॉर्च्यूनर से कर रहे हैं सफर
वर्तमान में राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और दो उपमुख्यमंत्री सहित कुल 24 मंत्री हैं। मुख्यमंत्री समेत अधिकतर मंत्री अभी इनोवा गाड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कुछ मंत्री अपनी निजी फॉर्च्यूनर से भी आवागमन करते हैं। हाल ही में सरकार ने फैसला लिया कि सभी मंत्रियों और कुछ अन्य अहम पदों पर बैठे अधिकारियों को नई लग्जरी फॉर्च्यूनर गाड़ियां उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके लिए एक प्रस्ताव तैयार कर मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजा गया था।
मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली खरीद की हरी झंडी
मुख्यमंत्री कार्यालय ने पहले चरण में सभी मंत्रियों के लिए फॉर्च्यूनर गाड़ियों की खरीद को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही बजट पर भी सहमति जताई गई। जिन फॉर्च्यूनर गाड़ियों को खरीदने की योजना है, वे लग्जरी मॉडल हैं और प्रति वाहन उनकी कीमत लगभग 54 लाख रुपये तय की गई है। योजना के मुताबिक कुल 41 फॉर्च्यूनर खरीदी जानी हैं, हालांकि पहले चरण में फिलहाल 24 मंत्रियों के लिए ही गाड़ियों की स्वीकृति दी गई है। इनमें से करीब दस फॉर्च्यूनर सरकार के पास पहुंच भी चुकी हैं। सरकार की मंशा है कि विधानसभा का शीतकालीन सत्र और बजट सत्र समाप्त होने के बाद ही ये गाड़ियां मंत्रियों को सौंपी जाएं, ताकि किसी तरह का राजनीतिक बवाल न खड़ा हो।
डोटासरा का हमला—व्यवस्था का मजाक
इस मुद्दे पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि राज्य में कई सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर हालत में हैं, छतें गिर रही हैं और हादसों में बच्चों की जान तक जा चुकी है। डोटासरा ने यह भी आरोप लगाया कि मिड-डे मील बनाने वाले रसोइयों को पिछले सात महीनों से मानदेय नहीं मिला है। ऐसे हालात में मंत्रियों के लिए महंगी फॉर्च्यूनर खरीदना जनता और शिक्षा व्यवस्था दोनों का मजाक उड़ाने जैसा है। उन्होंने कहा कि मंत्रियों के लिए चार साल पहले ही नई गाड़ियां खरीदी जा चुकी थीं, ऐसे में फिर से नई लग्जरी कारों की कोई जरूरत नहीं थी। उनके मुताबिक यह फैसला सिर्फ मंत्रियों के आराम और सुविधाओं के लिए लिया गया है, जबकि असली जरूरत बच्चों की सुरक्षित शिक्षा और स्कूल भवनों की मरम्मत की है।
मंत्री का पलटवार—शौक नहीं, मजबूरी है नई गाड़ियां
कांग्रेस के आरोपों पर कैबिनेट मंत्री कन्हैया लाल चौधरी ने भी जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष बेवजह मुद्दा बना रहा है। नई गाड़ियों की खरीद पूरी तरह जरूरी थी, क्योंकि पुरानी गाड़ियां लगभग चार साल पुरानी हो चुकी हैं और लंबे दौरों के दौरान उनके खराब हो जाने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने साफ किया कि फॉर्च्यूनर कोई शौक की चीज नहीं, बल्कि जरूरत है। अगर मंत्री बिना रुकावट जनता के बीच पहुंचेंगे, तो प्रशासनिक कामकाज भी तेजी से हो सकेगा।
गौरतलब है कि राजस्थान शिक्षा विभाग ने हाल ही में हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान बताया था कि राज्य के सरकारी स्कूलों की इमारतों की मरम्मत के लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता है। विभाग ने यह भी स्वीकार किया कि सरकार के पास फिलहाल पर्याप्त फंड नहीं है और इसके लिए पूंजीपतियों व विभिन्न संस्थाओं से सहयोग मांगा जा रहा है।














