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राजस्थान में नगर निकाय मुखियाओं का चुनाव सीधे मतदाताओं से, पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर हो सकता है बड़ा बदलाव

पड़ोसी भाजपा शासित राज्यों में अपनाई जा रही प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को देखते हुए राजस्थान में भी इस दिशा में चर्चा तेज होती नजर आ रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो वर्ष 2026 के निकाय चुनावों में मतदाता खुद अपने नगर निकाय प्रमुख चुन सकेंगे।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Sat, 20 Sep 2025 11:31:22

राजस्थान में नगर निकाय मुखियाओं का चुनाव सीधे मतदाताओं से, पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर हो सकता है बड़ा बदलाव

जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव प्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब तक नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के अध्यक्षों और चेयरमेन का चुनाव निर्वाचित पार्षदों द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन पड़ोसी भाजपा शासित राज्यों में अपनाई जा रही प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को देखते हुए राजस्थान में भी इस दिशा में चर्चा तेज होती नजर आ रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता है, तो वर्ष 2026 के निकाय चुनावों में मतदाता खुद अपने नगर निकाय प्रमुख चुन सकेंगे।

वर्तमान व्यवस्था: पार्षदों के माध्यम से चुनाव


फिलहाल राजस्थान में नगर निकायों के मुखिया—चाहे वह नगर निगम का मेयर हो, नगर परिषद का अध्यक्ष हो या नगर पालिका का चेयरमेन—इनका निर्वाचन संबंधित निकाय के निर्वाचित पार्षदों द्वारा किया जाता है। यह एक अप्रत्यक्ष प्रणाली है, जिसमें आम जनता केवल पार्षदों का चुनाव करती है, जबकि अध्यक्ष का चुनाव उन्हीं पार्षदों द्वारा किया जाता है।

राज्य सरकार अथवा स्वायत्त शासन विभाग ने इस व्यवस्था में बदलाव को लेकर अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव या कानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं की है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इस पर गंभीरता से चर्चा शुरू हो चुकी है।

पड़ोसी राज्यों में लागू हो चुकी है प्रत्यक्ष प्रणाली

राजस्थान से सटे भाजपा शासित प्रदेशों—हरियाणा, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश—ने नगर निकायों के प्रमुखों के चुनाव को लेकर प्रत्यक्ष प्रणाली अपनाई है।

हरियाणा: मार्च 2025 में हुए नगर निगम और नगर पालिकाओं के चुनाव में अध्यक्षों का चुनाव सीधे जनता के वोट से कराया गया।

छत्तीसगढ़: फरवरी 2025 में संपन्न निकाय चुनावों में भी अध्यक्ष/चेयरमेन का चयन प्रत्यक्ष मतदान से किया गया।

मध्यप्रदेश: हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 2027 में होने वाले निकाय चुनावों में अध्यक्षों का चुनाव भी जनता के प्रत्यक्ष वोट से होगा।

इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, और प्रत्यक्ष प्रणाली को "जनता की भागीदारी बढ़ाने" तथा "स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने" की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है।

राजस्थान में भी दिखने लगे हैं बदलाव के संकेत

राजस्थान में हालांकि यह बदलाव अभी आधिकारिक रूप से प्रस्तावित नहीं है, लेकिन भाजपा संगठन के भीतर इस मुद्दे पर सक्रिय मंथन शुरू हो चुका है। प्रदेश के भाजपा नेताओं के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या अब समय आ गया है कि राजस्थान में भी निकाय प्रमुखों का चुनाव जनता से सीधे कराया जाए।

भीलवाड़ा से निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी, जो भाजपा सरकार को समर्थन दे रहे हैं, उन्होंने हाल ही में विधानसभा के मानसून सत्र में यह मुद्दा जोरशोर से उठाया। उन्होंने मांग की कि प्रदेश के निकाय चुनावों में अध्यक्षों और चेयरमेन का चयन सीधे आम जनता से मतदान के माध्यम से कराया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व पर, विशेषकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर इस बात का दबाव बढ़ सकता है कि वे अगले नगर निकाय चुनावों में यह प्रत्यक्ष प्रणाली लागू करें।

राजस्थान में वर्तमान में:

—10 नगर निगम

—47 नगर परिषदें

—242 नगर पालिकाएं हैं,

जिनमें प्रमुख पदों पर चुनाव प्रणाली में बदलाव एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक निर्णय होगा।

प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली: संभावित फायदे और असर

यदि राजस्थान में यह प्रणाली लागू होती है, तो इसके कई व्यापक प्रभाव हो सकते हैं:

लोकतांत्रिक भागीदारी में वृद्धि: आम मतदाता को यह अधिकार मिलेगा कि वह सीधे अपने नगर प्रमुख को चुने। इससे जवाबदेही बढ़ेगी और जनता से जुड़ाव भी गहरा होगा।

राजनीतिक समीकरणों में बदलाव:
राजनीतिक दलों को अध्यक्ष पद के लिए सीधे प्रत्याशी मैदान में उतारने का अवसर मिलेगा। इससे दलों की स्थानीय स्तर पर पकड़ और प्रचार रणनीतियों में भी बदलाव आ सकता है।

पार्षदों की भूमिका सीमित: पार्षदों की सत्ता कुछ हद तक सीमित हो सकती है क्योंकि अभी वे मिलकर अध्यक्ष चुनते हैं। इस बदलाव से गुटबाजी और भीतरघात की राजनीति में कमी आ सकती है।

क्या होंगे अगले कदम?

यदि भाजपा नेतृत्व और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस बदलाव को स्वीकार करते हैं, तो इसके लिए राज्य सरकार को मौजूदा कानूनों में संशोधन करने होंगे या फिर नए अधिसूचना आदेश जारी करने पड़ेंगे। चूंकि चुनाव आयोग की तैयारियों में भी समय लगता है, इसलिए यह निर्णय वर्ष 2026 के चुनावों से पहले लेना आवश्यक होगा।

बदलाव की आहट या राजनीतिक रणनीति?

राजस्थान में प्रत्यक्ष प्रणाली के संकेत अभी भले ही शुरुआती स्तर पर हों, लेकिन पड़ोसी राज्यों के उदाहरण और प्रदेश के कुछ विधायकों की सक्रिय मांगों ने इस विषय को राजनीतिक रूप से गर्मा दिया है। यदि भाजपा नेतृत्व इसे लागू करता है, तो यह राजस्थान की स्थानीय राजनीति में एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।


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