
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बार पूरे राजनीतिक परिदृश्य को चौंका दिया है। जहाँ एक तरफ एनडीए ने अप्रत्याशित रूप से ऐतिहासिक बढ़त हासिल की है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल को वर्षों बाद सबसे बड़ा झटका लगा है। 2010 के बाद पहली बार आरजेडी का प्रदर्शन इतना कमजोर नजर आया। फिर भी हार के इस कठिन दौर के बीच पार्टी के लिए एक अहम सांत्वना यह है कि वोट शेयर में उसने भाजपा और जेडीयू दोनों को पीछे छोड़ा है। शुरुआती छह घंटों की मतगणना के बाद जो आंकड़े सामने आए, वे बताते हैं कि विपक्ष के नेतृत्व में लड़ रहे तेजस्वी यादव की पार्टी को जनता ने अच्छी-खासी हिस्सेदारी दी है।
वोट प्रतिशत में RJD आगे
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में आरजेडी ने इस बार 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और कुल 22.84% वोट हासिल किए। यह वोट प्रतिशत भाजपा की तुलना में 1.86% अधिक और जेडीयू से लगभग 3.97% ज्यादा है। दिलचस्प बात यह है कि 2020 के चुनाव में भाजपा 75 सीटों पर जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि आरजेडी 74 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही थी। लेकिन मौजूदा रुझानों के मुताबिक इस बार आरजेडी महज़ 25 सीटों पर सिमटती दिखाई दे रही है। सीटों की घटती संख्या और वोट शेयर में बढ़त—दोनों ही आंकड़े पार्टी की स्थिति को मिश्रित संकेत देते हैं।
तेजस्वी अपनी ही सीट से पिछड़ते हुए
सबसे ज्यादा चर्चा का विषय तेजस्वी यादव का राघोपुर सीट से पीछे रहना है। महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जाने वाले तेजस्वी का इस तरह पिछड़ना समर्थकों के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका है। इसके साथ ही महागठबंधन में डिप्टी सीएम चेहरे के रूप में पेश किए गए वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी की पार्टी एक भी सीट पर आगे नहीं बढ़ पाई है। कांग्रेस की स्थिति भी बेहद कमजोर है—वह केवल एक सीट पर बढ़त हासिल कर सकी है, जबकि वाम दल तीन सीटों पर आगे चल रहे हैं।
एनडीए की ओर साफ़-सुथरी बढ़त
सत्ता पक्ष में तस्वीर कहीं अधिक मजबूत है। भाजपा 95 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि जेडीयू 84 सीटों पर आगे है। एलजेपी (रामविलास) 19 सीटों पर और जीतन राम मांझी की हम पार्टी 5 सीटों पर बढ़त में है। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकमत पार्टी भी चार सीटों पर आगे चल रही है। एनडीए के इस संयुक्त प्रदर्शन ने विपक्ष की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है।














