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घूस देने पर ही बनेगा घर? जानिए 'आदिवासियों' की पार्टी JMM की अबुआ योजना की असल सच्चाई! क्या हेमंत के वादे सिर्फ दिखावा हैं?

आदिवासी समाज के लिए जिन योजनाओं और वादों का हेमंत सोरेन की सरकार में ऐलान किया गया था, क्या वे धरातल पर उतर पाए हैं?

Posts by : Sandeep Gupta | Updated on: Mon, 18 Nov 2024 6:33:53

घूस देने पर ही बनेगा घर? जानिए 'आदिवासियों' की पार्टी JMM की अबुआ योजना की असल सच्चाई! क्या हेमंत के वादे सिर्फ दिखावा हैं?

झारखंड में 2024 विधानसभा चुनाव चल रहा है और एक बार फिर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) आदिवासियों के अधिकारों और कल्याण के मुद्दे पर अपनी धारा के साथ चुनावी मैदान में है। लेकिन सवाल यह है कि जो पार्टी खुद को आदिवासियों की सशक्त आवाज और उनके अधिकारों की रक्षा करने वाली पार्टी कहती है, क्या वह वास्तव में अपने शासन में आदिवासियों के जीवन में कोई ठोस बदलाव ला पाई है?

आदिवासी समाज के लिए जिन योजनाओं और वादों का हेमंत सोरेन की सरकार में ऐलान किया गया था, क्या वे धरातल पर उतर पाए हैं? अबुआ आवास योजना, भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर आदिवासी समाज को क्या मिल रहा है? ऐसे में भाजपा ने अबुआ आवास योजना को लेकर हेमंत सोरेन सरकार को घेरा है।

झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के सह-प्रभारी हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है,''झारखंड सरकार की 'अबुआ आवास योजना' 'बाबू आवास योजना' बन गई है। जब तक घूस नहीं देंगे, तब तक मकान नहीं मिलेगा।''

अबुआ आवास योजना का उद्देश्य और जमीनी हकीकत

अबुआ आवास योजना की शुरुआत 15 अगस्त 2023 को हुई थी। तब हेमंत सोरेन ने वादा किया था कि हम 25 लाख से अधिक झारखंडियों को अबुआ आवास के माध्यम से अपना पक्का छत देंगे। इस योजना के तहत झारखंड के गरीब वर्ग को 2 लाख रुपये में 3 कमरे वाला पक्का मकान देने का वादा किया गया है।

इस योजना का उद्देश्य आदिवासी समुदाय को उनका हक देना और उन्हें सुरक्षित, सस्ते और अच्छे घर मुहैया कराना था। लेकिन जब इस योजना की हकीकत पर नजर डालते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि हेमंत सोरेन सरकार के तहत आदिवासी समाज को अपने हक के लिए न केवल संघर्ष करना पड़ रहा है, बल्कि कई बार उन्हें इस योजना के तहत लाभ पाने के लिए घूस देने की मजबूरी भी उठानी पड़ रही है।

सिर्फ अबुआ आवास योजना के लिए ही नहीं बल्कि आपको सोशल मीडिया पर कई ऐसे आदिवासियों के वीडियो मिल जाएंगे जिसमें दावा किया जा रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से दी जाने वाली पीएम आवास योजना के लिए भी उन्हें रिश्व देनी पड़ रही है।

राज्य सरकार के आंकड़े दावा करते हैं कि अबुआ आवास योजना के तहत हजारों आदिवासी परिवारों को घर दिया गया है। झारखंड की अबुआ आवास योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2023-24 में दो लाख आवास निर्माण की स्वीकृति दी जा चुकी है। जून 2024 में अबुआ आवास योजना की समीक्षा के दौरान ये जानकारी दी गई थी कि अबुआ आवास योजना के तहत पहले चरण में स्वीकृत किए गए 2 लाख आवास की पहली किस्त की राशि जारी हो गई है। लेकिन ये 2 लाख घर कब तक बनेंगे इसकी जानकारी अब तक सामने नहीं आई है।

अबुआ आवास योजना की अधिकारिक वेबसाइट पर भी इसके तहत कितने घर बनाए गए हैं, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। वहां लिखा है कि राज्य सरकार वर्ष 2026 तक सभी बेघर और जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों को बुनियादी सुविधाओं सहित पक्का आवास उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। वर्ष 2016 से प्रधानमंत्री आवास योजना - ग्रामीण (PMAY-G) अंतर्गत लगभग 16 लाख घर उपलब्ध कराए गए हैं एवं बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर आवास योजना अंतर्गत लगभग 50 हजार आवास बनाए गए हैं।

अबुआ आवास योजना: भ्रष्टाचार और घोटालों की संभावना

हेमंत सोरेन सरकार के तहत झारखंड में आदिवासी कल्याण के नाम पर कई योजनाएं चलाई गईं, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक लाभ उन्हें पहुंचाने में जो सबसे बड़ी रुकावट आई है, वह है भ्रष्टाचार। अबुआ आवास योजना के मामले में भी आदिवासी समुदाय को घूस की दरारों में धकेल दिया गया है। स्थानीय अधिकारी, जो आदिवासियों के लिए घर देने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, वे खुद को रिश्वत के बदले काम करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां आदिवासी परिवारों ने खुलासा किया कि योजना के तहत आवास पाने के लिए उन्हें एक विशेष राशि अधिकारियों को देनी पड़ी है। इसके बिना आवास निर्माण के लिए न तो फंड जारी होते हैं और न ही कोई प्रगति होती है।

अबुआ आवास योजना की जमीन पर वास्तविकता बिल्कुल अलग है। वनइंडिया हिंदी के ग्राउंड रिपोर्ट में नाम न छापने की शर्त पर कई आदिवासी परिवारों का कहना है कि उन्हें योजना का लाभ उठाने के लिए न केवल लंबी नौकरशाही प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है, बल्कि कई स्थानों पर यह भी आरोप है कि आवास की स्वीकृति के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। यह रिश्वत सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों और पंचायत नेताओं को दी जाती है ताकि वे आवास निर्माण के लिए फंड स्वीकृत करें और काम को समय पर पूरा करने की व्यवस्था करें।

अबुआ आवास योजना के तहत कितने घर बने, इस सवाल का उत्तर फिलहाल स्पष्ट नहीं है। राज्य सरकार ने शुरू में दावा किया था कि योजना के तहत लाखों आदिवासी परिवारों को घर मिलेंगे, लेकिन अब तक के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना का वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम रहा है। जमीन पर स्थिति कुछ और ही दिखती है। अधिकांश आदिवासी इलाकों में लोग यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें योजना का कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला।

हेमंत सोरेन सरकार के तहत कई बार यह आरोप लगाए गए हैं कि राज्य में आवास योजना के तहत भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। ठेकेदारों और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से योजना के तहत आवंटित फंड का गलत उपयोग किया जा रहा है। कई इलाकों में निर्माण कार्य आधे-अधूरे हैं और बिना गुणवत्ता की निगरानी के हुए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि आदिवासी समुदाय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता कितनी सच्ची और ईमानदार है। बजट का सही तरीके से उपयोग न होने के कारण हजारों परिवारों को फायदा तो दूर, नुकसान हुआ है।

अधिकारियों का भ्रष्टाचार न केवल योजना के लक्ष्य को विफल कर रहा है बल्कि यह आदिवासियों को और भी कठिनाई में डाल रहा है। कई स्थानों पर तो यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि सरकार ने योजना के तहत आवंटित राशि को न केवल गलत तरीके से बांटा है, बल्कि कई ठेकेदारों और अधिकारियों ने योजना का लाभ उठाकर खुद को और अपने परिवारों को फायदा पहुंचाया है। कागजी और ऑनलाइन प्रक्रिया की जानकारी ना होने की वजह से भी आदिवासी समुदाय भ्रष्टाचार का शिकार हो रहे हैं।

यह स्पष्ट रूप से बताता है कि राज्य सरकार की नीयत आदिवासी कल्याण के लिए कितनी ईमानदार है। क्या यह योजना वास्तव में आदिवासी समाज के विकास के लिए बनाई गई थी, या यह केवल नेताओं और अधिकारियों की जेब भरने का एक साधन बन गई है?

अधिकारों का उल्लंघन और प्रशासनिक लापरवाही

अबुआ आवास योजना के तहत आदिवासी समुदाय को जो अधिकार मिल रहे थे, वह भी पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में यह देखा गया कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का भारी अभाव है।

ज्यादातर आदिवासी परिवारों का आरोप है कि उन्हें योजना के बारे में कोई सही जानकारी नहीं दी जाती और उन्हें लंबे समय तक कागजी कार्रवाई और दस्तावेजी मामलों में उलझाकर रखा जाता है। इसके बाद जब वे किसी तरह से आवास की स्वीकृति प्राप्त करते हैं, तो उन्हें काम करने के लिए ठेकेदारों या सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। यह न केवल आदिवासियों के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इसे सरकार की नाकामी और लापरवाही के तौर पर भी देखा जा सकता है।

क्या हेमंत सोरेन सरकार आदिवासियों के साथ धोखा कर रही है?


हेमंत सोरेन सरकार ने आदिवासी समुदाय के लिए कई घोषणाएं की थीं, लेकिन इन घोषणाओं को लागू करने में सरकार कहीं न कहीं नाकाम रही है। आदिवासी समुदाय के अधिकारों को सुरक्षित रखने का वादा करने वाली सरकार, आज उन्हीं अधिकारों को पाने के लिए आदिवासियों को घूस देने की स्थिति में ला खड़ा कर रही है। यह न केवल एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह आदिवासी समाज के साथ धोखा करने के बराबर है।

झारखंड राज्य में हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ आदिवासी समुदाय के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। उनकी कई मांगें पूरी नहीं हो पा रही हैं और योजना के नाम पर उन्हें कोई ठोस लाभ नहीं मिल रहा है। वे यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय, सरकार उनके अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। इस असंतोष ने राज्य के राजनीतिक माहौल को और भी तंग कर दिया है और कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन और आंदोलन बढ़े हैं।

हेमंत सोरेन सरकार के शासनकाल में आदिवासियों को क्या वाकई उनका हक मिल पाया है, या फिर उनका शोषण और अधिकारों का उल्लंघन पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है? अबुआ आवास योजना, भूमि अधिग्रहण, रोजगार के अवसर, और अन्य विकास योजनाओं के तहत आदिवासियों की स्थिति क्या है? इन सवालों का उत्तर झारखंड के चुनाव में अहम है? झारखंड चुनाव के नतीजे ये बताएंगे कि क्या वाकई JMM उनकी आवाज बन पाई है, या फिर यह केवल एक राजनीतिक मोहरा बनकर रह गया है।

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