
आज का विद्यार्थी ही आने वाले कल का निर्माता है। वही आगे चलकर समाज और राष्ट्र की दिशा तय करता है। मगर वर्तमान समय में पढ़ाई का दबाव, प्रतिस्पर्धा की होड़ और अपेक्षाओं का बोझ कई छात्रों को भीतर से तोड़ देता है। परीक्षा में असफलता कुछ युवाओं को इतनी गहरी निराशा में धकेल देती है कि वे जीवन से ही हार मान बैठते हैं। ऐसी परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन ही सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। आध्यात्मिक संत प्रेमानंद महाराज ने भी विद्यार्थियों को जीवन में संयम, अनुशासन और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा दी है। उनका मानना है कि यदि छात्र इन मूल्यों को आत्मसात कर लें, तो सफलता स्वयं उनके कदम चूमेगी।
पवित्र आचरण ही असली आधार
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि किसी भी क्षेत्र में ऊंचाई हासिल करने के लिए चरित्र की शुद्धता अनिवार्य है। यदि व्यवहार और आचरण निर्मल नहीं है, तो उपलब्धियां भी टिक नहीं पातीं। शिखर तक पहुंचने में वर्षों की मेहनत लगती है, लेकिन पतन में एक क्षण भी नहीं लगता। इसलिए विद्यार्थियों को सबसे पहले अपने आचरण को सुदृढ़ बनाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य और अनुशासन का महत्व
उन्होंने ब्रह्मचर्य को जीवन की बड़ी साधना बताया। उनका कहना है कि जब तक विवाह संस्कार न हो, तब तक युवाओं को संयमित और वैरागी जीवनशैली अपनानी चाहिए। प्राचीन समय में गुरुकुल व्यवस्था का उद्देश्य भी यही था कि विद्यार्थी अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीखें। आत्मसंयम से ही मन की शक्ति बढ़ती है और अध्ययन में एकाग्रता आती है।
आधुनिक संबंधों पर चेतावनी
महाराज ने वर्तमान दौर में बढ़ते गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के चलन पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, कम उम्र में ऐसे रिश्तों में उलझना विद्यार्थियों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। इससे न तो वे गृहस्थ जीवन के योग्य बन पाते हैं और न ही ब्रह्मचर्य की मर्यादा निभा पाते हैं। गलत संगति और असंयमित आचरण न केवल स्वयं को दुख देता है, बल्कि माता-पिता को भी पीड़ा पहुंचाता है। इसलिए समय रहते सही राह चुनना आवश्यक है।
संगत और विचारों की शक्ति
वे कहते हैं कि मनुष्य जैसा सुनता, देखता और बोलता है, वैसा ही उसका चिंतन बनता है। विचार धीरे-धीरे आदत में बदल जाते हैं और आदतें कर्म का रूप ले लेती हैं। इसलिए विद्यार्थियों को चाहिए कि वे नकारात्मक संगति से तुरंत दूरी बना लें। अच्छी संगति और सकारात्मक विचार जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
व्यायाम और तपस्वी जैसी पढ़ाई
ब्रह्मचर्य के पालन में शारीरिक व्यायाम को भी उन्होंने अनिवार्य बताया। यदि शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो मन भी एकाग्र नहीं रह पाएगा। विद्यार्थियों को सुबह उठकर नियमित व्यायाम करना चाहिए। इसके बाद जिस प्रकार एक तपस्वी साधना में लीन रहता है, उसी तरह छात्र को अध्ययन में मन लगाना चाहिए। पढ़ाई केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मविकास का माध्यम है।
विद्या से विनम्रता
उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा मनुष्य को विनम्र बनाती है। भले ही किसी को तुरंत रोजगार न मिले, लेकिन शिक्षित और अशिक्षित व्यक्ति के व्यवहार में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। ज्ञान व्यक्ति को माता-पिता और समाज की सेवा के योग्य बनाता है। इसलिए पढ़ाई को बोझ नहीं, बल्कि साधना के रूप में देखना चाहिए।
रोज 5-10 मिनट नाम जप
प्रेमानंद महाराज ने विद्यार्थियों को एक सरल उपाय भी सुझाया। उनका कहना है कि दिन में कम से कम 5 से 10 मिनट ईश्वर के नाम का जप करना चाहिए। जिस भी भगवान में आस्था हो, उसका स्मरण करें। यदि अलग से समय न मिले तो स्कूल या कॉलेज जाते समय भी मन ही मन नाम जप किया जा सकता है। इससे मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ता है।
असफलता अंत नहीं
अंत में उन्होंने असफलता को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। यदि परीक्षा में असफलता मिल जाए तो निराश न हों। एक बार की हार जीवन का फैसला नहीं करती। कई बार माता-पिता की डांट या दोस्तों के तानों से आहत होकर छात्र गलत कदम उठा लेते हैं, जो कभी समाधान नहीं है। उन्होंने प्रेरित किया कि गिरकर फिर उठना ही सच्ची जीत है। हम ईश्वर की संतान हैं, इसलिए निरंतर प्रयास करते रहें—एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी।













