
श्रीहरिकोटा से भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक और अहम उपलब्धि जुड़ने की उम्मीद थी, लेकिन यह मिशन अंतिम चरण में आकर अटक गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने PSLV-C62/ईओएस-एन1 मिशन के तहत एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ को अंतरिक्ष में स्थापित करने की कोशिश की, मगर प्रक्षेपण के दौरान PS3 स्टेज में तकनीकी खराबी सामने आ गई। इसी कारण यह मिशन अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका।
यह उपग्रह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया गया था और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
सुबह 10:18 बजे हुई थी लॉन्चिंग
ISRO का यह अभियान PSLV का 64वां मिशन था, जिसे PSLV-C62/ईओएस-एन1 नाम दिया गया था। इसे आज सुबह 10:18 बजे आंध्र प्रदेश स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया। इस मिशन के जरिए कुल 15 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जाना था, जिनमें सबसे अहम और गोपनीय उपग्रह ‘अन्वेषा’ भी शामिल था।
लॉन्च के शुरुआती चरणों में रॉकेट की उड़ान सामान्य रही और सब कुछ योजना के मुताबिक आगे बढ़ता नजर आया, लेकिन जैसे ही मिशन अपने निर्णायक चरण में पहुंचा, तकनीकी दिक्कतें सामने आने लगीं।
PS3 स्टेज में दिखी असामान्य गतिविधि
ISRO अधिकारियों के अनुसार, PSLV-C62 के तीसरे चरण यानी PS3 स्टेज के अंतिम हिस्से में असामान्य व्यवहार देखा गया। स्टेज को अनियंत्रित रूप से घूमते हुए देखा गया, जिससे मिशन की स्थिरता पर असर पड़ा। यही तकनीकी गड़बड़ी मिशन के असफल होने की प्रमुख वजह बनी।
गौर करने वाली बात यह है कि इससे पहले के एक लॉन्च मिशन में भी इसी स्टेज से जुड़ी समस्या सामने आई थी। ऐसे में अब ISRO इस खराबी के कारणों को गंभीरता से जांचने में जुट गया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि उपग्रह को भविष्य में किस तरह दोबारा लॉन्च किया जाएगा।
शुरू हुई विस्तृत तकनीकी जांच
मिशन फेल होने के तुरंत बाद ISRO ने डेटा एनालिसिस और तकनीकी समीक्षा प्रक्रिया शुरू कर दी है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि PS3 स्टेज में बार-बार आ रही इस समस्या की जड़ क्या है और भविष्य के अभियानों में इसे कैसे रोका जा सकता है। इस जांच के नतीजों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
क्या है हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक?
‘अन्वेषा’ उपग्रह में हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, जिसे आधुनिक निगरानी प्रणालियों में एक क्रांतिकारी कदम माना जाता है। यह तकनीक जंगलों की गहराइयों से लेकर दुश्मन के इलाके में छिपी बेहद छोटी गतिविधियों तक को पहचानने में सक्षम होती है।
यह केवल तस्वीरें ही नहीं लेती, बल्कि प्रकाश के उन सूक्ष्म तरंगदैर्घ्यों को भी रिकॉर्ड करती है, जिन्हें सामान्य मानव आंखें नहीं देख सकतीं। इसी वजह से साधारण सैटेलाइट इमेजिंग की तुलना में यह तकनीक कहीं अधिक सटीक और प्रभावशाली मानी जाती है। हाइपरस्पेक्ट्रल सिस्टम सामान्य कैमरे को एक अत्याधुनिक जासूसी निगरानी उपकरण में बदल देता है, जो रक्षा और सुरक्षा अभियानों के लिए बेहद अहम है।













