
रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही बहस के बीच भारत सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दिए जाने के बाद विपक्ष ने केंद्र की Narendra Modi सरकार को घेरने की कोशिश की। हालांकि सरकार ने साफ शब्दों में कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी भी देश से अनुमति लेने का मोहताज नहीं है और राष्ट्रीय हित के आधार पर जहां से बेहतर कीमत मिलेगी, वहीं से कच्चा तेल खरीदा जाएगा।
सरकार के अनुसार मौजूदा वैश्विक हालात, खासकर Strait of Hormuz के आसपास बढ़ते तनाव को देखते हुए ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता बेहद जरूरी है। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर जोखिम बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद भारत की तेल आपूर्ति फिलहाल सुरक्षित और संतुलित बताई जा रही है।
ऊर्जा आपूर्ति को लेकर सरकार का भरोसा
केंद्र सरकार ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कच्चे तेल के स्रोतों को काफी हद तक विविधीकृत किया है। पहले जहां भारत लगभग 27 देशों से तेल आयात करता था, वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 40 देशों तक पहुंच चुकी है। इससे ऊर्जा आपूर्ति के कई वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हो गए हैं और किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है।
सरकार का कहना है कि भारत की आधुनिक रिफाइनरी क्षमता विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को प्रोसेस करने में सक्षम है। यही वजह है कि देश दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले तेल का इस्तेमाल कर सकता है और ऊर्जा आपूर्ति को बिना रुकावट जारी रख सकता है।
रूस से तेल खरीद जारी रखने का फैसला
भारत ने शनिवार, 7 मार्च 2026 को यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका द्वारा दी गई अस्थायी छूट के बावजूद रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रहेगा। यह छूट मुख्य रूप से मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार में पैदा हुई अस्थिरता के कारण दी गई थी।
सरकार ने दो टूक कहा कि रूस से तेल खरीदने के लिए भारत को किसी अन्य देश की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। नई दिल्ली अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही आयात से जुड़े फैसले लेती है।
रूस बना हुआ है प्रमुख सप्लायर
सरकारी सूत्रों के मुताबिक फरवरी 2026 में भी भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता रहेगा। फिलहाल रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
दरअसल Russia–Ukraine War के पिछले तीन वर्षों के दौरान भारत ने अमेरिका और यूरोपीय संघ की आपत्तियों के बावजूद रूस से तेल खरीदना जारी रखा है। इसका मुख्य कारण रियायती कीमतों पर उपलब्ध रूसी कच्चा तेल और भारतीय रिफाइनरियों की बढ़ती मांग रही है।
2022 के बाद से रूस से भारत के तेल आयात में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम कीमत पर उपलब्ध तेल ने भारत को अपनी ऊर्जा लागत नियंत्रित रखने में मदद की है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर
मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री शिपिंग मार्गों पर भी असर पड़ा है। कई जगहों पर तेल परिवहन प्रभावित हुआ है, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है।
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी प्रशासन ने 5 फरवरी 2026 को रूस पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी थी। इसका उद्देश्य समुद्र में पहले से मौजूद रूसी तेल से भरे जहाजों को भारत जैसे देशों तक पहुंचने की अनुमति देना था, ताकि वैश्विक बाजार में सप्लाई पूरी तरह बाधित न हो।
भारत ने दिया स्पष्ट संदेश
केंद्र सरकार का कहना है कि रूस के साथ व्यापार पहले भी जारी था और आगे भी चलता रहेगा। भारत का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होती है और इसी आधार पर नीतियां तय की जाती हैं।
सरकार ने यह भी कहा कि भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइन्ड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यातक है। ऐसे में विविध स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने की रणनीति न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती है, बल्कि वैश्विक बाजार में उसकी स्थिति को भी मजबूत बनाती है।













