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इस्लाम में तलाक के बाद 'इद्दत' की परंपरा: क्यों पति-पत्नी को 30 दिनों तक एक ही कमरे में रहना होता है? क्या है इसकी वजह?

इस्लाम में तलाक के बाद इद्दत की अवधि के दौरान पति-पत्नी को 30 दिनों तक एक साथ एक ही कमरे में रहने की परंपरा क्यों निभाई जाती है? जानिए इस नियम के पीछे की धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक वजहें।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Sun, 15 June 2025 08:54:23

इस्लाम में तलाक के बाद 'इद्दत' की परंपरा: क्यों पति-पत्नी को 30 दिनों तक एक ही कमरे में रहना होता है? क्या है इसकी वजह?

इस्लाम में तलाक को लेकर कई तरह के धार्मिक नियम व कायदे बनाए गए हैं, जिनका पालन करना हर मुस्लिम का धार्मिक कर्तव्य और नैतिक जिम्मेदारी होती है। भले ही तीन तलाक को भारत में गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में अभी भी विभिन्न प्रकार के तलाक प्रचलन में हैं, जो शरीयत के अनुसार होते हैं।

क्या आप जानते हैं कि मुस्लिम समाज में तलाक की प्रक्रिया के बावजूद पति-पत्नी को 30 दिनों तक एक ही कमरे में रहना क्यों आवश्यक माना जाता है? चलिए जानते हैं इस प्रथा के पीछे छिपी वजह और इसके धार्मिक-सामाजिक महत्व को।

इद्दत से जुड़ा है यह नियम

इस्लाम धर्म में तलाक से जुड़ी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसे इद्दत कहा जाता है। यह एक प्रकार की प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) होती है, जिसका पालन करना हर मुस्लिम महिला के लिए अनिवार्य माना गया है। यह नियम न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्थिरता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

अगर किसी मुस्लिम महिला के पति की मृत्यु हो जाती है तो उसे 4 महीने 10 दिन तक इद्दत की अवधि पूरी करनी होती है। वहीं तलाक की स्थिति में यह अवधि तीन महीने की होती है। इसी इद्दत की अवधि के दौरान, इस्लामी परंपरा के अनुसार, तलाक के बावजूद पति-पत्नी को 30 दिनों तक एक ही कमरे में साथ रहने की सलाह दी जाती है, ताकि उन्हें अपने रिश्ते पर पुनर्विचार करने का अवसर मिल सके।

क्या है 30 दिनों तक साथ रहने का नियम?

इस्लामी शरीयत के तहत तलाक के बाद महिला को इद्दत की अवधि का पालन करना आवश्यक होता है। इस दौरान वह किसी भी अन्य पुरुष से विवाह नहीं कर सकती है और ना ही कोई संबंध बना सकती है। यह नियम महिला की सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक स्थिति को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

30 दिन साथ रहने का यह नियम अनिवार्य नहीं होता, लेकिन यह एक पारंपरिक सामाजिक सुझाव है, जिसका उद्देश्य तलाकशुदा जोड़े को दोबारा मिलाने की संभावना तलाशना होता है। इस समय के दौरान अगर दोनों के बीच समझौता हो जाए तो वे दोबारा साथ आ सकते हैं।

क्यों आवश्यक होती है इद्दत?


इद्दत की अवधि का पालन करना केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य व्यावहारिक और वैज्ञानिक भी है। इस अवधि के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि तलाकशुदा महिला गर्भवती तो नहीं है। यदि वह गर्भवती होती है, तो उसे बच्चे के जन्म तक पुनर्विवाह की अनुमति नहीं होती। इसके अलावा, बच्चे के जन्म के बाद भी उसे इद्दत की एक निर्धारित अवधि पूरी करनी होती है।

इस नियम से यह सुनिश्चित होता है कि अगला विवाह सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से पारदर्शी, न्यायपूर्ण और संतुलित हो। इस्लामी कानून इस तरह के नियमों के माध्यम से न

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