
पश्मीना शॉल केवल सर्दी से बचाने वाला ऊनी कपड़ा नहीं, बल्कि कश्मीर और लद्दाख की सदियों पुरानी शिल्प परंपरा का प्रतीक है। इसकी नर्मी, गर्माहट और शाही अहसास इसे आम ऊनी शॉल से बिल्कुल अलग बनाते हैं। लेकिन आज के समय में बाजार नकली और सेमी-सिंथेटिक पश्मीना से भरा पड़ा है, जो देखने में बिल्कुल असली जैसे लगते हैं। ऐसे में अगर आप पश्मीना शॉल खरीदने की सोच रहे हैं और 30–40 हजार रुपये तक खर्च करने जा रहे हैं, तो पहले उसकी असलियत जांचना बेहद जरूरी हो जाता है।
अक्सर ग्राहक सिर्फ लुक और मुलायम स्पर्श के आधार पर धोखा खा जाते हैं और नकली पश्मीना के लिए भी भारी कीमत चुका देते हैं। हालांकि, कुछ खास पहचान और आसान तरीकों की मदद से आप असली और नकली पश्मीना में फर्क आसानी से समझ सकते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि शुद्ध पश्मीना की पहचान कैसे करें।
ऊन का स्रोत और उसकी क्वालिटी
असली पश्मीना का निर्माण लद्दाख क्षेत्र में पाई जाने वाली चांगथांगी (Changthangi) नस्ल की बकरियों के अंडरकोट से किया जाता है। ये बकरियां बेहद ठंडे और कठोर मौसम में रहती हैं, जिससे उनके शरीर पर उगने वाला ऊन बेहद महीन, हल्का और गर्म होता है। यही खासियत पश्मीना को बाकी ऊन से अलग बनाती है।
इस ऊन की मोटाई इंसानी बाल से भी कहीं ज्यादा पतली होती है, इसलिए इससे बनी शॉल न केवल सॉफ्ट होती है, बल्कि असाधारण रूप से गर्म भी रहती है। किसी भी दूसरी नस्ल की भेड़ या बकरी का ऊन इस स्तर की गर्माहट और कोमलता नहीं दे सकता।
वजन से पहचानें असली पश्मीना
पश्मीना की एक बड़ी पहचान उसका बेहद हल्का वजन है। शुद्ध पश्मीना शॉल इतनी हल्की होती है कि पहली बार हाथ में लेने पर लोग हैरान रह जाते हैं। आमतौर पर एक असली पश्मीना शॉल का वजन लगभग 170 से 180 ग्राम के आसपास होता है, जबकि पश्मीना स्टोल का वजन 90–100 ग्राम तक हो सकता है।
अगर शॉल हाथ में लेने पर भारी लगे या मोटा महसूस हो, तो समझ लें कि उसमें किसी न किसी तरह का मिलावटी फाइबर या सिंथेटिक मटीरियल इस्तेमाल किया गया है। असली पश्मीना हमेशा हल्का, फ्लोई और नेचुरल फील देता है।
बर्न टेस्ट से करें असली-नकली की जांच
पश्मीना की शुद्धता जांचने का सबसे भरोसेमंद तरीका बर्न टेस्ट माना जाता है। इसके लिए शॉल के किनारे से बहुत ही पतला सा धागा निकालें और उसे आग के पास ले जाएं।
असली पश्मीना:
जब यह जलता है, तो धीरे-धीरे सुलगता है और जलते बालों जैसी गंध आती है। जलने के बाद जो राख बचती है, वह बिल्कुल महीन पाउडर की तरह होती है और उंगलियों से मसलने पर आसानी से बिखर जाती है।
नकली या सिंथेटिक पश्मीना:
इस तरह का धागा आग के संपर्क में आते ही पिघलने लगता है, प्लास्टिक जैसी गंध देता है और जलने के बाद कठोर गांठ में बदल जाता है, न कि राख में।
बुनावट और फिनिशिंग पर डालें नजर
असली पश्मीना के धागे इतने नाजुक होते हैं कि उन्हें मशीन से बुनना संभव ही नहीं होता। यही वजह है कि शुद्ध पश्मीना हमेशा हाथ से बुना जाता है। हैंडमेड होने के कारण इसकी बुनावट में हल्की-फुल्की असमानता नजर आ सकती है, जो इसकी असलियत का संकेत है।
वहीं मशीन से बने शॉल की फिनिशिंग बहुत ज्यादा परफेक्ट और एक जैसी होती है। अगर कोई दुकानदार आपको बेहद सटीक, एकदम मशीन जैसी फिनिशिंग वाला शॉल “शुद्ध पश्मीना” बताकर बेच रहा है, तो सतर्क हो जाना चाहिए।
जीआई (Geographical Indication) टैग जरूर देखें
पश्मीना शॉल एक महंगा और दीर्घकालिक निवेश होता है। इसलिए खरीदारी के समय जीआई टैग की मांग करना बिल्कुल न भूलें। यह टैग इस बात की गारंटी देता है कि शॉल असली कश्मीरी या लद्दाखी पश्मीना से बना है और निर्धारित क्षेत्र में ही तैयार किया गया है।
जीआई टैग वाले पश्मीना उत्पादों की गुणवत्ता, स्रोत और प्रामाणिकता पर भरोसा किया जा सकता है। बिना टैग के बेहद सस्ते दामों पर मिलने वाला “पश्मीना” अक्सर नकली ही होता है।
समझदारी से करें खरीदारी
पश्मीना शॉल सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि कला, मेहनत और विरासत का संगम है। इसलिए जल्दबाजी में सिर्फ लुक देखकर फैसला न लें। ऊन का स्रोत, वजन, बुनावट, बर्न टेस्ट और जीआई टैग—इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही खरीदारी करें। थोड़ी-सी सतर्कता आपको ठगी से बचा सकती है और आप असली पश्मीना की शान और सुकून का असली अनुभव ले पाएंगे।













