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समीक्षा ‘द बंगाल फाइल्स’ ट्रेलर: विवेक अग्निहोत्री का नया विवाद या पुराने फार्मूले का दोहराव?

भारतीय सिनेमा में विवेक रंजन अग्निहोत्री का नाम अब "फ़ाइल्स" ब्रांड का पर्याय बन चुका है। द ताशकंद फाइल्स ने चौंकाया, द कश्मीर फाइल्स ने बॉक्स ऑफिस और राजनीति दोनों में हलचल मचाई।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Sat, 16 Aug 2025 7:36:46

समीक्षा ‘द बंगाल फाइल्स’ ट्रेलर: विवेक अग्निहोत्री का नया विवाद या पुराने फार्मूले का दोहराव?

भारतीय सिनेमा में विवेक रंजन अग्निहोत्री का नाम अब "फ़ाइल्स" ब्रांड का पर्याय बन चुका है। द ताशकंद फाइल्स ने चौंकाया, द कश्मीर फाइल्स ने बॉक्स ऑफिस और राजनीति दोनों में हलचल मचाई। लेकिन अब सवाल है—क्या द बंगाल फाइल्स इस ट्रिलॉजी का ताज बनेगी या यह फ्रैंचाइज़ी खुद के ही फार्मूले में फँसकर बासी हो चुकी है?

15 मिनट का प्रीव्यू – शोर ज्यादा, सार कम?


ट्रेलर लॉन्च से पहले दिखाया गया 15 मिनट का कट एक स्मार्ट मार्केटिंग ट्रिक थी। ऐतिहासिक फुटेज और ड्रामेटिक रीएनैक्टमेंट का मेल असरदार लगा, लेकिन कहीं-कहीं यह "शॉक वैल्यू" के लिए बनाई गई कोलाज जैसी भी प्रतीत हुई। विवेक की यह रणनीति अब अनुमानित हो चुकी है—पहले "सच का वादा", फिर "विवाद की चिंगारी", और फिर "भावनात्मक उबाल"।

ट्रेलर: भावनाओं की सेंधमारी

तेज़ कट्स, आक्रामक संवाद, धार्मिक प्रतीक और पीड़ित-खलनायक वाला ब्लैक-एंड-व्हाइट नैरेटिव—यह सब ‘फाइल्स’ ब्रांड की पहचान बन चुका है। लेकिन समस्या यही है कि जब हर फिल्म एक जैसी दिखने लगे, तो संवेदनशील इतिहास भी सिनेमाई स्लोगन में बदल जाता है। सवाल यह है कि विवेक इतिहास को खोलते हैं या उसे केवल "मंचीय भाषण" में ढाल देते हैं?

विवाद – पहले से तय पटकथा?

टीज़र में काली माँ की मूर्ति जलाने वाला दृश्य और उसके बाद हुई FIRs। कोर्ट का हस्तक्षेप। मीडिया में सुर्खियाँ। यह पैटर्न अब इतना बार-बार दोहराया गया है कि यह संयोग से ज़्यादा सुनियोजित लगता है। कहीं न कहीं यह एहसास होता है कि विवेक के लिए विवाद अब "कंटेंट" का हिस्सा है—जितना विवाद, उतनी पब्लिसिटी।

कलाकार – प्रतिभा का इस्तेमाल या दुरुपयोग?

मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर, पल्लवी जोशी और दर्शन कुमार जैसे कलाकार किसी भी फिल्म को वज़नदार बना सकते हैं। लेकिन फ़ाइल्स फिल्मों में यह दिग्गज अक्सर गहराई वाले किरदारों की बजाय "विचारधारा के पोस्टर" बनकर रह जाते हैं। अगर द बंगाल फाइल्स भी यही गलती दोहराती है, तो इन कलाकारों की मौजूदगी सिर्फ़ प्रचार सामग्री तक सीमित हो जाएगी।

फ्रैंचाइज़ी की गिरावट – प्रयोग से प्रोपेगैंडा तक

द ताशकंद फाइल्स में जिज्ञासा थी।

द कश्मीर फाइल्स में तीव्र भावनाएँ थीं।

लेकिन तीसरे अध्याय तक आते-आते यह ब्रांड अपने ही clichés में फँसता दिख रहा है। इतिहास की जटिल परतें विवेक की सिनेमाई भाषा में गायब हो जाती हैं और बचता है सिर्फ़ उत्तेजना पैदा करने वाला टोन। यही सबसे बड़ी कमजोरी है—सिनेमा का रूप तो है, लेकिन सिनेमा का आत्मा खो जाती है।

‘द बंगाल फाइल्स’ का ट्रेलर बताता है कि विवेक फिर वही करेंगे जो वे अब तक करते आए हैं—भावनाओं और विवाद का पैकेज बेचना। फर्क बस इतना होगा कि इस बार जगह है बंगाल। अब यह फिल्म सचमुच एक "ईमानदार सिनेमाई दस्तावेज़" साबित होगी या सिर्फ़ "प्रोपेगैंडा की तीसरी किस्त", यह 5 सितंबर 2025 को साफ़ हो जाएगा। लेकिन अभी तक के संकेत यही बताते हैं कि ट्रिलॉजी का यह आख़िरी हिस्सा पहले दो की छाया भर है—और वही छाया शायद इस ब्रांड की सबसे बड़ी सीमा भी है।

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