
हिन्दी सिनेमा में बहुत से अदाकार आए और गए। हर अदाकार ने अपनी एक अलग शैली विकसित की, अपनी पहचान बनाई और दर्शकों के जहन में बस गए। इन्हीं सितारों में शामिल थे अभिनेता राजकुमार, जिन्हें फिल्म उद्योग में अखड़ अदाकार के तौर पर जाना जाता था, साथ ही यह भी कहा जाता था कि उनके जैसा दूसरा ऐसा कोई अदाकार नहीं आया जिसने अपनी दमदार रौबीली आवाज को अपनी पहचान बनाया हो। कहा तो यह भी जाता था कि अंधा भी राजकुमार की फिल्म देखकर सिर्फ उनकी आवाज पर ही उनकी पहचान कर देता था। गुरुवार 3 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि है।
जिनकी आवाज़ ने संवाद को अमर बना दिया
हिंदी सिनेमा में अगर किसी अभिनेता की आवाज़ को पहचान की तरह पूजा गया है, तो वह नाम है राज कुमार। वह अभिनेता जो संवादों को केवल बोलता नहीं था, बल्कि अपने अंदाज़ से उन्हें अमर कर देता था। फिल्म ‘पाकीजा’ का मशहूर डायलॉग—“आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे।” या फिर ‘वक्त’ का तीखा व्यंग्य—“चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।” इन पंक्तियों ने न केवल पर्दे पर तहलका मचाया, बल्कि हिंदी भाषा में संवाद-लेखन और संवाद-अदायगी की नई मिसाल गढ़ दी।
संवादों को आत्मा देने वाले अभिनेता
राज कुमार सिर्फ अभिनय नहीं करते थे, वो संवादों में रूह फूंक देते थे। उनके ‘जानी’ कहने भर से दृश्य जीवंत हो उठता था। उनकी संवाद अदायगी में जो गरिमा, ठहराव और व्यंग्य था, वो किसी और कलाकार के बस की बात नहीं थी। वे नायक की तरह संवाद बोलते थे, लेकिन उनमें खलनायक की धार भी होती थी।
एक पुलिस अधिकारी से फिल्मी सितारे तक का सफर
राज कुमार का जन्म 8 अक्टूबर 1926 को बलूचिस्तान के लोरलाई (अब पाकिस्तान) में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनका असली नाम था कुलभूषण पंडित। उन्होंने पढ़ाई के बाद मुंबई के माहिम थाने में सब-इंस्पेक्टर के रूप में कार्य किया। लेकिन नियति ने उनके लिए कैमरे की दुनिया लिख रखी थी।
एक पुलिसकर्मी की सलाह और निर्माता बलदेव दुबे की पेशकश के बाद उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और 1952 में फिल्म ‘रंगीली’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती करियर में उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली, लेकिन उनका आत्मविश्वास अडिग रहा।
'मदर इंडिया' से मिली पहली पहचान
1957 में आई महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ ने उनके अभिनय को नई पहचान दी। इसमें उन्होंने नरगिस के पति की भूमिका निभाई, जो भले ही छोटी थी, लेकिन असरदार थी। निर्देशक महबूब ने उनसे चंद मिनटों में वो काम करवाया था जो उनसे पहले कोई निर्देशक नहीं कर सका था। कर्ज के बोझ तले दबे किसान की परिवार को न पाल सकने की मजबूरी को राजकुमार ने अपनी अदायगी से जिस तरह से परदे पर उतारा वह किसान की सम्पूर्ण बेबसी का चित्रण था। इस भूमिका ने उन्हें वो पहचान दी जो फिर कभी नहीं मिट सकी। यहीं से उनकी किस्मत ने करवट ली और हिंदी सिनेमा को एक ऐसा अभिनेता मिला जो शब्दों से आग और भावना दोनों निकाल सकता था।

अभिनय की पराकाष्ठा: 1960 और 70 का दशक
महबूब खान की मदर इंडिया के बाद राजकुमार को अपनी जिन्दगी का सबसे बेहतरीन किरदार मिला 1959 की फिल्म ‘पैगाम’ में जिसने उन्होंने दिलीप कुमार के बड़े भाई की भूमिका को इतने सजीव अंदाज में परदे पर उतारा कि दर्शकों के दिलो दिमाग से दिलीप कुमार का साया उतर गया और राजकुमार का साया छा गया। पैगाम की सफलता का पूरा श्रेय राजकुमार को गया, नतीजा दिलीप कुमार ने उनके साथ फिर काम नहीं किया। इन दोनों सितारों को एक साथ फिर परदे पर लाने का काम 30 साल बाद स्वयंभू शोमैन सुभाष घई ने किया। उन्होंने दिलीप कुमार को राजकुमार के साथ काम करने के लिए राजी किया। सुभाष घई इससे पूर्व दिलीप कुमार को लेकर विधाता सरीखी ब्लॉकबस्टर दे चुके थे। उनकी क्षमता को देखकर दिलीप कुमार ने हाँ भरी।
पैगाम के बाद राजकुमार ने लगातार एक से बढ़कर एक फिल्में दीं। इसके बाद तो उन्होंने एक के बाद एक ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, ‘घराना’, ‘गोदान’, ‘दिल एक मंदिर’, ‘वक्त’, ‘काजल’, ‘नीलकमल’, ‘मेरे हुजूर’, ‘कर्मयोगी’, ‘धरम कांटा’, जैसी फिल्मों से खुद को स्थापित कर दिया।
‘वक्त’ में उनके द्वारा निभाए गए रोल और बोली गई पंक्तियां आज भी क्लासिक कही जाती हैं। उनकी आवाज़ और आंखों के भाव संवादों से पहले दर्शक के दिल तक पहुंच जाते थे।
संवादों के बादशाह: राज कुमार
राज कुमार की सबसे बड़ी ताकत थी—संवाद। उनके द्वारा बोले गए डायलॉग केवल संवाद नहीं थे, बल्कि समय के साथ संस्कृति का हिस्सा बन गए।
‘पाकीजा’ का—
‘आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे’
‘वक्त’ का—
‘चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते’
फिल्म ‘सौदागर’ का संवाद—
“हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे। लेकिन, वह वक्त भी हमारा होगा। बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी।”
या
‘तिरंगा’ का—
“हम आंखों से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं।”
या
‘मरते दम तक’ का—
“हम कुत्तों से बात नहीं करते।”
हर एक संवाद उनकी बेबाकी, आत्मविश्वास और शैली का प्रतिबिंब था।
अपनी शर्तों पर जीने वाले कलाकार
राज कुमार कभी फिल्मी चकाचौंध में नहीं बहते थे। वे अपने शर्तों पर फिल्में करते थे। उन्हें अगर कोई संवाद पसंद नहीं आता, तो वे उसे बदल देते। वो अपनी हर फिल्म के बाद अपनी फीस बढ़ा देते थे। इस बारे में उनका कहना था—“फिल्म फ्लॉप हो सकती है, लेकिन मेरा अभिनय नहीं।” इसी आत्मविश्वास ने उन्हें भीड़ से अलग खड़ा किया।
उनकी फीस तक उनके मूड और शर्तों पर तय होती थी। वे किसी भी दबाव में नहीं आते थे और अपने प्रिंसिपल्स से कभी समझौता नहीं करते थे।
आखिरी दौर और एक शांत विदाई
राज कुमार को 1990 के दशक में गले का कैंसर हो गया था। इस बारे में उन्होंने कभी सार्वजनिक तौर पर कोई चर्चा नहीं की। वह अपने दर्द को भी स्टाइल में जीने वाले कलाकार थे।
3 जुलाई 1996 को 69 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार गुपचुप तरीके से हो—और वैसा ही हुआ।
उनकी विरासत अमर है
राज कुमार को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया। लेकिन असली सम्मान उन्हें अपने दर्शकों से मिला—जो आज भी उनकी फिल्मों के संवाद दोहराते हैं, उनकी आवाज़ की नकल करते हैं और उन्हें एक संपूर्ण अभिनेता मानते हैं।
राज कुमार सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वो एक संवेदनात्मक शैली थे। उन्होंने अभिनय को शब्दों, भावों और आत्मा से जोड़ा। उनकी फिल्मों में केवल कहानी नहीं थी, वहां एक अनुभव था। हिंदी सिनेमा में संवादों की गरिमा को ऊंचाई देने वाले इस कलाकार की कमी आज भी खलती है।
राज कुमार को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि जब भी कोई दमदार डायलॉग सुनाई दे, तो दिल से निकले—“यह तो राज कुमार का स्टाइल है… जानी।”














