
नीरज घेवान की फिल्म 'होमबाउंड' को 98वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी ऑस्कर 2026 के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री के रूप में चुना गया है। एक ऐसी फिल्म, जिसकी नींव एक सच्ची घटना पर आधारित अख़बारी रिपोर्ट से पड़ी और जो न सिर्फ सामाजिक यथार्थ को चुनौती देती है, बल्कि निर्देशक के अपने जीवन के अनुभवों को भी पर्दे पर उकेरती है। फिल्म को फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की 13 सदस्यीय जूरी ने 24 फिल्मों में से चुना है, जिसकी अध्यक्षता अनुभवी निर्देशक एन. चंद्रा ने की थी।
'होमबाउंड' न सिर्फ एक सिनेमा है, बल्कि एक बयान है — एक ऐसा बयान जो आधुनिक भारत की राजनीति, जातिगत भेदभाव, धार्मिक असमानता और सामाजिक असुरक्षा के खिलाफ मुखर होकर खड़ा होता है। फिल्म के केंद्र में दो युवा—मोहम्मद शोएब और चंदन कुमार—हैं, जो बचपन के दोस्त हैं और गरीबी से निकलकर पुलिस ऑफिसर बनने का सपना देखते हैं। ईशान खट्टर और विशाल जेठवा ने इन पात्रों को जीवंत किया है, जिनकी जोड़ी फिल्म की आत्मा है। जाह्नवी कपूर और रीमा शेख जैसे नाम भी फिल्म की स्टारकास्ट का हिस्सा हैं।
फिल्म की कहानी COVID-19 लॉकडाउन के दौरान मजबूरी में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटते मजदूरों पर आधारित है। लेकिन यह सिर्फ एक यात्रा नहीं है, यह उस सामाजिक और मानसिक यात्रा की कहानी है, जो दलित और मुस्लिम जैसे हाशिये पर खड़े समुदायों को हर रोज़ तय करनी पड़ती है। कहानी पत्रकार बशारत पीर के 2020 में The New York Times में प्रकाशित एक लेख से प्रेरित है, जिसका शीर्षक बाद में "A Friendship, A Pandemic and A Death Beside the Highway" हो गया। इस आर्टिकल को धर्मा प्रोडक्शन के एक निर्माता ने पढ़ा, नीरज घेवान से साझा किया और यहीं से 'होमबाउंड' की बुनियाद पड़ी।
फिल्म को मार्टिन स्कॉर्सेसे जैसे दिग्गज का समर्थन भी मिला है, जिन्होंने इसके एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में काम किया और एडिटिंग प्रोसेस के दौरान तीन अलग-अलग कट देखे। कान्स और टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे मंचों पर फिल्म को पहले ही स्टैंडिंग ओवेशन मिल चुका है और अब यह बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी में ऑस्कर की दौड़ में है।
नीरज घेवान के लिए 'होमबाउंड' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का विस्तार है। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि फिल्म में उनके कई व्यक्तिगत अनुभवों की झलक है। एक दलित परिवार में पले-बढ़े नीरज कहते हैं कि इस फिल्म के ज़रिए उन्होंने खुद को सामने लाने की कोशिश की है। एक सीन में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह एक दलित युवक अपने पूरे नाम को छुपाता है, ताकि पहचान से पहले उस पर फैसले न सुना दिए जाएं। वहीं मुस्लिम किरदार शोएब का संघर्ष बताता है कि किस तरह धर्म भी आज के भारत में एक सामाजिक बोझ बन चुका है।
फिल्म पितृसत्ता पर भी तीखा सवाल उठाती है। घेवान का मानना है कि चाहे आप किसी भी समुदाय से हों, पुरुष होने का विशेषाधिकार हर जगह कायम है और यह एक साझा असमानता है जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है।
'होमबाउंड' की ऑस्कर एंट्री ने उम्मीदें जगा दी हैं। भारत की तरफ से अब तक 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' ही बेस्ट इंटरनेशनल फीचर कैटेगरी में नॉमिनेशन तक पहुंच सकी हैं, लेकिन जीत अभी भी दूर है। क्या नीरज घेवान की 'होमबाउंड' इस खामोशी को तोड़ पाएगी?
यह सवाल भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि 'होमबाउंड' एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ ऑस्कर की दौड़ में नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के विकास और आत्ममंथन की दौड़ में भी सबसे आगे है।














