
भारत के महान सपूत दारा सिंह, जिन्हें ‘रुस्तम-ए-पंजाब’ और ‘रुस्तम-ए-हिंद’ जैसे गरिमामय खिताबों से नवाजा गया, वो ना सिर्फ अखाड़े के बेताज बादशाह थे बल्कि फिल्मी दुनिया में भी अपनी बुलंद पहचान बना गए। उनकी गठीली काया, दमदार आवाज़ और आत्मविश्वास भरी आंखों ने उन्हें एक प्रेरणा बना दिया। दारा सिंह का जीवन साहस, संघर्ष और सम्मान की मिसाल रहा है। उन्होंने अपने दौर में कुश्ती को केवल खेल नहीं, बल्कि देश का गौरव बना दिया।
उनका सफर सिर्फ मिट्टी से लिपटे अखाड़े तक ही सीमित नहीं रहा। दारा सिंह ने लगभग 500 मुकाबले लड़े और हैरानी की बात यह कि उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 1968 में उन्होंने अमेरिकी पहलवान लाऊ थेज को हराकर भारत को पहली बार फ्रीस्टाइल रेसलिंग में विश्व चैंपियनशिप दिलाई। यही नहीं, उन्हें अक्सर गामा पहलवान के समकक्ष माना गया, जिनकी तरह वे भी अपराजित रहे। दोनों ने विदेशी धरती पर भारत की ताकत का डंका बजाया और देशवासियों के आत्मसम्मान को नई उड़ान दी।
इतिहास गवाह है कि गामा पहलवान विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए, लेकिन दारा सिंह भारत में रहकर स्वतंत्र भारत की कुश्ती को नई ऊंचाई देते रहे। उनकी जीतों ने जहां गामा ने औपनिवेशिक भारत को हौसला दिया, वहीं दारा सिंह ने आज़ाद भारत में कुश्ती को सम्मान और पहचान दिलाई।
उनकी ताकत का एक किस्सा आज भी लोगों की जुबान पर है – जब उन्होंने 200 किलो वजनी ऑस्ट्रेलियन पहलवान किंग कॉन्ग को रिंग से उठाकर बाहर फेंक दिया था, तब मानो हर भारतीय के दिल में एक गर्व की लहर दौड़ गई थी। 55 की उम्र में विजयी विदाई लेते हुए उन्होंने आखिरी बार अखाड़े में कदम रखा और फिर हमेशा के लिए रेसलिंग को अलविदा कह दिया।
लेकिन उनका सफर यहीं नहीं थमा। उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया और 1952 की फिल्म 'संगदिल' से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। दिलीप कुमार और मधुबाला जैसे दिग्गजों के साथ काम कर उन्होंने एक्टिंग में भी खुद को साबित किया। खास बात यह रही कि मुमताज के साथ उन्होंने 16 फिल्मों में साथ काम किया, जिनमें से 10 फिल्में सुपरहिट रहीं। दर्शकों ने इस जोड़ी को खूब पसंद किया और दोनों के रिश्ते को लेकर चर्चाएं भी जोरों पर रहीं।
उनकी सबसे यादगार भूमिकाओं में से एक ‘हनुमान’ का किरदार रहा, जो उन्होंने रामानंद सागर की 'रामायण' में निभाया। इस भूमिका के लिए उन्होंने नॉन-वेज खाना भी छोड़ दिया था, और आज भी लोग उन्हें उसी रूप में याद करते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने संसद तक का सफर तय किया और राज्यसभा के सदस्य के रूप में देश सेवा भी की।
दारा सिंह न सिर्फ एक महान पहलवान और अभिनेता थे, बल्कि वे सच्चे देशभक्त भी थे। आज भी उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धा से याद करता है – एक ऐसा इंसान, जो हर मंच पर अपनी ताकत, संयम और संस्कारों से लोगों के दिलों पर राज कर गया।














