सीता नवमी: सीता मां के जन्म से जुड़ी ये रोचक पौराणिक कथाएं जानकर रह जाएंगे हैरान

By: Pinki Tue, 10 May 2022 08:51 AM

सीता नवमी: सीता मां के जन्म से जुड़ी ये रोचक पौराणिक कथाएं जानकर रह जाएंगे हैरान

वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान राम की पत्नी देवी सीता धरती पर अवतरित हुई थीं। इसलिए इस तिथि को जानकी नवमी और सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। मां लक्ष्मी का अवतार माता सीता भूमि रूप हैं,भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा और राजा जनक की पुत्री होने से उन्हें जानकी भी कहा जाता है। श्री रामजी की प्राणप्रिया सीताजी के जन्म के बारे में रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं।

हम में से ज्यादातर लोग रामायण के केवल उस संस्करण के बारे में जानते हैं जिसमें बहन सूर्पनाखा की नाक कटने के बाद बदले की आग में झुलस रहा रावण देवी सीता का अपहरण कर लेता है। लेकिन भारतीय पौराणिक कथाएं रहस्यों की एक अनोखी दुनिया है। मूल ग्रंथों, शास्त्रों के अलावा, ऐसी लोक कथाएं और मौखिक परंपराएं हैं जो इन महाकाव्यों को ज्यादा आकर्षक बनाती हैं। इनमें से कई कथाएं आपको हैरान कर सकती हैं।

रामायाण की पूरी कहानी सीता के अपहरण और भगवान राम और रावण के बीच युद्ध के ईर्द-गिर्द घूमती है। बहन सूर्पनखा की नाक कटने के बाद रावण ने बदले की भावना से सीता का अपहरण किया था। हालांकि कई लोक कथाओं और प्राचीन ग्रंथों में माता सीता को रावण की पुत्री बताया गया है।

ऐसा कहा जाता है कि माता सीता का जन्म धरती से हुआ था। राजा जनक को खेत जोतने के दौरान सीता एक कलश में मिली थीं। राजा जनक सीता को घर ले आए और उनकी परवरिश की। उत्तर-पश्चिम में रामायण के एक संस्करण के मुताबिक, सीता को मेनका की दिव्य संतान कहा जाता है जिसे राजा जनक ने गोद लिया था। कुछ ग्रंथों में सीता को जनक की असली पुत्री बताया गया है।

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वेदवती का अवतार सीता

रामायण के कुछ संस्करणों में माता सीता को वेदवती का अवतार बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार जब वेदवती भगवान विष्णु की उपासना कर रही थी तो रावण उसकी सुंदरता से सम्मोहित हो उठा। रावण ने वेदवती और उसकी भक्ति को बाधित करने का प्रयास किया। इससे तंग आकर वेदवती ने खुद को चिता में झोंक लिया और अंतिम समय में रावण से कहा कि अगले जन्म में वही रावण के अंत की वजह बनेगी। रामायण के इस संस्करण के मुताबिक, सीता ही वेदवती का अवतार थी।

सीता रावण की असली बेटी

जैन रामायण का एक संस्करण सीता को रावण की असली बेटी बताता है। इस संस्करण के अनुसार, मंदोदरी को जब सीता के रूप में संतान प्राप्त हुई तो रावण बहुत खुश हुआ। लेकिन जैसी ही ये भविष्यवाणी हुई कि सीता ही रावण के विनाश की वजह बनेगी, उसने तुरंत सीता को कहीं दूर छोड़ने का आदेश दे दिया। हालांकि रावण ने हमेशा सीता के ठिकाने पर नजर बनाए रखी।

जब रावण को पता चला कि सीता किसी जनक राजा को खेत में मिल गई है तो वह बहुत प्रसन्न हुआ कि उसकी बेटी आज भी एक रानी की जिंदगी बिता रही है। जैन रामायण के अनुसार, रावण अपनी अपनी बेटी सीता के स्वयंवर में भी शामिल हुआ था। रावण यह जानकर काफी खुश था कि उसका विवाह अयोध्या के राजा राम से हो रहा है। 14 साल के वनवास से पहले तक सब ठीक ही चल रहा था।

जब रावण को पता लगा कि उसकी बेटी राम के साथ वनवास भोग रही है तो उसने फौरन सीता का अपहरण कर उसे वापस लंका ले आने का फैसला कर लिया। लोगों ने इसे रावण के प्रतिशोध के रूप में देखा, क्योंकि राम-लक्ष्मण ने उसकी बहन सूर्पनखा की नाक काट दी थी। हालांकि रावण अपनी बेटी को दुखों के चुंगल से निकालना चाहता था। यहां तक कि रावण की पत्नी मंदोदरी ने भी सीता के प्रति उसके प्रेम को गलत समझा, क्योंकि वह नींद में उसका नाम दोहराता रहता था।

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अद्भुत रामायण की कथा के अनुसार

अद्भुत रामायण की कथा के अनुसार गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह अति तीक्ष्ण विष हैं इसे संभालकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी और मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी। जबकि उस वक्त रावण विहार करने सह्याद्रि पर्वत पर गया था। ऐसे में मंदोदरी ने सोचा कि जब मेरे पति मेरे पास नहीं है। ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा। तो वह क्या सोचेंगे। यही सब सोचते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र चली ग ई। कहा जाता है कि वहीं पर उसने गर्भ को निकालकर एक घड़े में रखकर भूमि में दफन कर दिया और सरस्वती नदी में स्नान कर वह वापस लंका लौट गई। मान्यता है कि वही घड़ा हल चलाते वक्त मिथिला के राजा जनक को मिला था,जिसमें से सीताजी प्रकट हुईं थी।

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