
महाशिवरात्रि का पावन पर्व भगवान शिव की उपासना का सर्वोत्तम अवसर माना जाता है। इस दिव्य रात्रि में साधक उपवास, जप, ध्यान और रात्रि जागरण के माध्यम से शिव कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि महाशिवरात्रि की रात को चार प्रहरों में विभाजित कर पूजा-अर्चना की जाए तो उसका पुण्य अनेक गुना बढ़ जाता है। विशेष रूप से इन चारों प्रहरों में शिव चालीसा का पाठ करना अत्यंत मंगलकारी माना गया है।
शिव चालीसा भगवान शंकर की महिमा, करुणा, पराक्रम और भक्तवत्सल स्वरूप का वर्णन करती है। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन को शांति मिलती है, कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर प्रत्येक प्रहर में एक बार शिव चालीसा पढ़ने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
सोमवार, प्रदोष व्रत तथा अन्य शुभ तिथियों पर भी शिव चालीसा का पाठ कल्याणकारी माना गया है, किंतु महाशिवरात्रि की रात्रि में इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस रात शिव तत्व विशेष रूप से जाग्रत रहता है, इसलिए भक्ति और श्रद्धा से किया गया पाठ शीघ्र फलदायी होता है। शिव चालीसा का उच्च स्वर में पाठ करना उत्तम माना गया है, ताकि आसपास उपस्थित लोग भी इसे सुनकर पुण्य के भागी बन सकें।
यदि आप महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा कर रहे हैं, तो प्रत्येक प्रहर में अभिषेक, मंत्रजाप और आरती के साथ शिव चालीसा का पाठ अवश्य करें। यह साधना आत्मबल को बढ़ाती है और भगवान शंकर की विशेष कृपा प्राप्त कराने वाली मानी जाती है।
नीचे प्रस्तुत है संपूर्ण शिव चालीसा, जिसका पाठ महाशिवरात्रि के दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है:
शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi)
॥ दोहा ॥
श्री गणेश गिरिजा सुवन , मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
॥ दोहा ॥
नित नेम कर प्रातः ही, पाठ करौ चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥
महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा में यदि श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ शिव चालीसा का पाठ किया जाए, तो यह साधना जीवन के कष्टों को दूर करने और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है। भोलेनाथ की कृपा से भक्त के जीवन में शांति, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।














