देश में डिजिटल भुगतान का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर एक अहम बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने संसद में भुगतान से जुड़े कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया है, जिसके बाद व्यापारियों पर UPI लेनदेन के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किए जाने की संभावना बढ़ गई है। हालांकि फिलहाल प्रस्तावित व्यवस्था का असर सीधे ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में बड़ा बदलाव आ सकता है।
सूत्रों के अनुसार सरकार और नीति निर्माता ऐसे मॉडल पर विचार कर रहे हैं, जिसमें UPI का इस्तेमाल करने वाले आम उपभोक्ताओं को भुगतान के लिए कोई अतिरिक्त शुल्क न देना पड़े, जबकि कुछ श्रेणी के व्यापारियों पर ट्रांजैक्शन आधारित शुल्क लगाया जा सकता है।
सरकार किन विकल्पों पर कर रही है विचार?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल दो प्रमुख विकल्पों पर चर्चा चल रही है। पहला प्रस्ताव यह है कि एक तय सीमा से अधिक राशि वाले UPI ट्रांजैक्शन पर MDR लागू किया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि व्यापारियों के वार्षिक कारोबार के आधार पर शुल्क तय किया जाए।
सूत्रों का कहना है कि सरकार की प्राथमिकता छोटे कारोबारियों और आम उपभोक्ताओं को किसी भी अतिरिक्त वित्तीय बोझ से बचाने की है। इसी वजह से विचार किया जा रहा है कि केवल बड़े कारोबारियों से ही यह शुल्क लिया जाए, जबकि छोटे व्यापारियों और ग्राहकों के लिए UPI भुगतान पहले की तरह निःशुल्क बना रहे।
बड़े व्यापारियों पर लग सकता है MDR
सरकारी सूत्रों के अनुसार एक प्रस्ताव के तहत ऐसे व्यापारियों पर MDR लगाने की संभावना है, जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है। प्रस्ताव में यह भी चर्चा है कि 2,000 रुपये से ऊपर के UPI ट्रांजैक्शन पर 0.3% से 0.5% तक का MDR लगाया जा सकता है।
ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की रिपोर्ट के मुताबिक, 2,000 रुपये से अधिक मूल्य वाले ट्रांजैक्शन कुल UPI लेनदेन की संख्या का केवल लगभग 4 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू में इनकी हिस्सेदारी करीब 67 प्रतिशत है। ऐसे में सरकार बड़े मूल्य वाले भुगतानों पर शुल्क लगाने के विकल्प को व्यावहारिक मान रही है।
संसद में पेश हुआ संशोधन विधेयक
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में भुगतान और निपटान प्रणाली (Payment and Settlement Systems) अधिनियम में संशोधन से जुड़ा विधेयक पेश किया। उद्योग और नियामक क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का मानना है कि इस संशोधन के जरिए डिजिटल भुगतान पर MDR लागू करने के लिए कानूनी आधार तैयार किया जा सकता है।
हालांकि अभी यह अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है कि शुल्क की दर क्या होगी और किन श्रेणियों के लेनदेन पर इसे लागू किया जाएगा। इस संबंध में वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
UPI का तेजी से बढ़ता विस्तार
आज UPI दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट प्रणालियों में शामिल हो चुका है। जुलाई महीने के दौरान इस प्लेटफॉर्म पर लगभग 23.6 अरब ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए, जिनका कुल मूल्य करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा।
भारतीय डिजिटल पेमेंट बाजार में फिलहाल वॉलमार्ट समर्थित PhonePe और Google Pay की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। इनके अलावा Paytm भी इस क्षेत्र का प्रमुख खिलाड़ी बना हुआ है और करोड़ों लोग रोजमर्रा के भुगतान के लिए इन ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं।
आखिर MDR लागू करने की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है?
रॉयटर्स के अनुसार, डिजिटल पेमेंट उद्योग लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि UPI लेनदेन पर किसी न किसी रूप में राजस्व मॉडल तैयार किया जाए। फिलहाल UPI भुगतान पर कंपनियों को कोई MDR नहीं मिलता, जिससे पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और अन्य भागीदारों के लिए इस व्यवस्था में लगातार निवेश करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
उद्योग का मानना है कि यदि कोई टिकाऊ राजस्व व्यवस्था नहीं बनी तो भविष्य में डिजिटल पेमेंट नेटवर्क के विस्तार और नई तकनीकों में निवेश प्रभावित हो सकता है।
क्या होता है मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR)?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वह शुल्क होता है, जिसे व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देते हैं। वर्तमान में भारत में क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर आम तौर पर करीब 1.5 प्रतिशत तक MDR लिया जाता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह शुल्क लगभग 0.9 प्रतिशत तक हो सकता है।
इसके विपरीत, अभी तक UPI भुगतान पर व्यापारियों से किसी प्रकार का MDR नहीं लिया जाता। यदि प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो पहली बार कुछ श्रेणी के व्यापारियों के लिए UPI ट्रांजैक्शन पर भी यह शुल्क लागू किया जा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला सरकार की अधिसूचना और नियमों के बाद ही स्पष्ट होगा।













