
भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में गणेश चतुर्थी का पर्व सबसे अधिक हर्षोल्लास से मनाया जाने वाला त्योहार है। हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। यह पर्व केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत और विश्वभर में बसे भारतीय समुदायों में भी उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। भक्त इस दिन बप्पा को घर और पंडालों में आमंत्रित करते हैं और पूरे समर्पण भाव से उनकी पूजा-अर्चना कर समृद्धि और सुख-शांति का आशीर्वाद मांगते हैं।
गणेश चतुर्थी का इतिहास और महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार, गणेश जी का जन्म माता पार्वती ने गंध और मिट्टी से किया था। वे भगवान शिव और पार्वती के पुत्र तथा कार्तिकेय के भाई माने जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में उन्हें प्रथम पूज्य देवता कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणपति पूजन से ही होती है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का पर्व बुद्धि, समृद्धि और मंगलकामनाओं का प्रतीक माना जाता है।
इतिहास बताता है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय गणेश चतुर्थी को सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का साधन बनाया। सार्वजनिक गणेशोत्सव के रूप में यह पर्व जन-जन का त्योहार बन गया, जिसका असर आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
गणेश स्थापना की परंपरा
गणेश चतुर्थी पर भक्त अपने घरों और मोहल्लों में गणपति बप्पा की मूर्तियां स्थापित करते हैं। घर में प्रतिमा को आमंत्रित करने से पहले पूजा स्थल को शुद्ध और पवित्र किया जाता है। लकड़ी के तख्त पर लाल कपड़ा बिछाकर स्वस्तिक बनाया जाता है और गंगाजल का छिड़काव कर वातावरण को शुद्ध किया जाता है। इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर दीप, धूप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।
गणेश चतुर्थी की पूजा में विशेष महत्व मोदक का होता है, क्योंकि यह भगवान गणेश का प्रिय भोग माना जाता है। इसके साथ-साथ लड्डू, फल और नारियल भी अर्पित किए जाते हैं।
पूजा के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें
गणपति बप्पा घर में मेहमान के रूप में आते हैं, इसलिए उनकी सेवा और पूजा विशेष सावधानी से करनी चाहिए। प्रतिदिन उनकी आरती और मंत्र-जाप करना आवश्यक है। बप्पा के सामने प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन का सेवन वर्जित माना जाता है। भक्तों को सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।
घर का वातावरण शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण बनाए रखना भी बेहद आवश्यक है। परिवार के सदस्यों को आपसी झगड़ों से बचना चाहिए ताकि बप्पा प्रसन्न रहें और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे।
गणेश जी को अकेला न छोड़ें
गणपति को घर में अतिथि का स्थान दिया जाता है। जैसे हम किसी मेहमान को अकेला नहीं छोड़ते, वैसे ही गणेश प्रतिमा को भी अकेला छोड़ना उचित नहीं है। उनकी उपस्थिति में हमेशा परिवार के किसी सदस्य को रहना चाहिए। यह आस्था और श्रद्धा की मर्यादा का हिस्सा है।
विसर्जन का महत्व
गणेश चतुर्थी के समापन पर गणेश विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। विसर्जन का अर्थ है प्रतिमा को जल में प्रवाहित करना, जो प्रतीक है जीवन की अस्थिरता और सृष्टि के शाश्वत चक्र का। विसर्जन करते समय भक्त बप्पा से प्रार्थना करते हैं कि वे शीघ्र पुनः घर लौटें और भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें।
विसर्जन के दौरान बचने योग्य गलतियां
गणेश विसर्जन के समय कई लोग अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिन्हें धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता—
—मूर्ति का विसर्जन करने से पहले भोग और नैवेद्य अर्पित अवश्य करें।
—नारियल चढ़ाए बिना विसर्जन करना अशुभ माना जाता है।
—प्रतिमा को फूल-मालाओं और सजावट के साथ नदी या तालाब में न डालें।
—सजावटी सामान और माला को कूड़ेदान या जल में फेंकने की बजाय पुनः उपयोग करें या दान करें।
—विसर्जन निर्धारित शुभ मुहूर्त में ही करें।
—विसर्जन के तुरंत बाद घर की सजावट हटाने के बजाय वातावरण को कुछ समय तक भक्तिमय बनाए रखें।
गणेश विसर्जन की विधि
विसर्जन के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। लकड़ी के तख्त पर स्वस्तिक बनाकर गंगाजल का छिड़काव करें और गणेश प्रतिमा को स्थापित करें। फिर उनके वस्त्र बदलें, तिलक करें और मोदक, फल, पुष्प तथा दीप अर्पित करें। गणेश चालीसा और मंत्रों का जाप करें और आरती गाकर बप्पा से आशीर्वाद लें।
इसके बाद नारियल लेकर गणेश प्रतिमा के साथ विसर्जन स्थल की ओर जाएं। वहां गणेश जी का नाम जपते हुए, शुद्ध भाव से प्रतिमा का विसर्जन करें। इस अवसर पर भक्त ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयघोष के साथ उन्हें विदा करते हैं।
पर्यावरण की दृष्टि से जिम्मेदारी
पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण की रक्षा को ध्यान में रखते हुए मिट्टी या प्राकृतिक रंगों से बनी गणेश प्रतिमाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियां नदियों और तालाबों को प्रदूषित करती हैं। ऐसे में पर्यावरण के अनुकूल प्रतिमाओं का चयन करना हर भक्त का दायित्व बन जाता है। इसके साथ ही कृत्रिम तालाबों और टैंकों में विसर्जन की व्यवस्था करना भी सराहनीय कदम है।
गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का पर्व है। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि श्रद्धा, अनुशासन और पवित्रता से किए गए कार्य हमेशा मंगलकारी होते हैं। यदि गणपति की पूजा और विसर्जन सही विधि और शुद्ध भाव से किया जाए, तो न केवल भगवान की कृपा प्राप्त होती है बल्कि घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
डिस्क्लेमर: यह आलेख सामान्य धार्मिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत है। किसी भी धार्मिक आस्था या परंपरा को लेकर अंतिम निर्णय व्यक्ति की अपनी श्रद्धा और मान्यता पर आधारित होना चाहिए।














