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ऐसी क्या मजबूरी थी कि माता-पिता ने बेटे की लंबी उम्र नहीं, उसकी मौत की दुआ मांगी? हरीश राणा की कहानी कर देगी भावुक

हरीश राणा की दर्दभरी कहानी जानकर कोई भी भावुक हो सकता है। 13 साल से कोमा जैसी हालत में जी रहे बेटे के लिए आखिर क्यों माता-पिता को उसकी मुक्ति की दुआ करनी पड़ी? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले ने इच्छामृत्यु और मानवीय गरिमा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 11 Mar 2026 1:14:41

ऐसी क्या मजबूरी थी कि माता-पिता ने बेटे की लंबी उम्र नहीं, उसकी मौत की दुआ मांगी? हरीश राणा की कहानी कर देगी भावुक

सिर्फ 32 वर्ष के हरीश राणा की हालत देखकर किसी का भी दिल दहल सकता है। उनका शरीर लगभग पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है और उनमें किसी प्रकार की हरकत दिखाई नहीं देती। साल 2013 से वह लगातार बिस्तर पर पड़े हुए हैं और कोमा जैसी स्थिति में जीवन जी रहे हैं।

एक गंभीर दुर्घटना के बाद हरीश क्वाड्रिप्लेजिया नामक बीमारी से पीड़ित हो गए, जिसमें शरीर पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है। डॉक्टरों के अनुसार उन्हें लगभग 100 प्रतिशत विकलांगता हो चुकी है। इस हालत में उनका पूरा जीवन मशीनों और मेडिकल उपकरणों के सहारे ही चल रहा था।

उनकी देखभाल के लिए उन्हें यूरिन बैग लगाया गया था और भोजन भी सीधे ट्यूब के जरिए दिया जाता था। ऐसे में उनके माता-पिता का कहना था कि अब वे अपने बेटे के लिए लंबी उम्र की प्रार्थना नहीं कर सकते, बल्कि चाहते हैं कि उसे इस पीड़ादायक जीवन से मुक्ति मिल जाए।

मां ने लगाई थी इच्छामृत्यु की गुहार, पहले मिल चुकी थी निराशा

हरीश की मां निर्मला देवी ने बताया कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिंदगी में ऐसा वक्त आएगा जब उन्हें अपने ही बेटे की मृत्यु की कामना करनी पड़ेगी। उनका कहना था कि एक मां के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक होती है।

अपने बेटे को इस कष्टदायक जीवन से राहत दिलाने के लिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। लेकिन 8 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय ने उनकी इस अपील को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी थी।

एक हादसे ने तोड़ दिए सारे सपने

हरीश राणा वर्ष 2013 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें खेलों का भी शौक था और वह वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का सपना देखते थे।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 2013 में रक्षाबंधन के दिन वह अपनी बहन से फोन पर बात कर रहे थे, तभी अचानक खबर आई कि वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए हैं। इस हादसे ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। गिरने के कारण उनके शरीर को इतना गंभीर नुकसान हुआ कि वह फिर कभी खड़े नहीं हो पाए।

बेटे के इलाज के लिए पिता ने लगा दी पूरी ताकत

हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे को ठीक करने के लिए हर संभव कोशिश की। उन्होंने देश के कई बड़े अस्पतालों में इलाज कराया, जिनमें PGI चंडीगढ़, AIIMS, RML, लोक नायक अस्पताल, अपोलो और फोर्टिस जैसे संस्थान शामिल थे। उन्होंने नामी डॉक्टरों से परामर्श लिया और हर इलाज करवाने की कोशिश की।

इसके बावजूद हरीश की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। उनके इलाज पर हर महीने लगभग 40 से 50 हजार रुपये तक खर्च हो जाते थे। इसके अलावा उनकी देखभाल के लिए एक नर्स भी रखी गई थी, जिसे करीब 27 हजार रुपये प्रति माह वेतन दिया जाता था।

आर्थिक संकट और बढ़ता मानसिक दबाव

63 वर्षीय अशोक राणा की मासिक पेंशन मात्र 3,500 रुपये थी। परिवार की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। उनका छोटा बेटा आशीष एक निजी कंपनी में नौकरी करता है, लेकिन इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाना उसके लिए भी बेहद मुश्किल हो गया था।

आर्थिक दबाव इतना बढ़ गया कि वर्ष 2021 में परिवार को दिल्ली स्थित अपना तीन मंजिला मकान भी बेच देना पड़ा। इसके बावजूद खर्चों का बोझ कम नहीं हुआ। हर दिन अपने बेटे को इस हालत में देखना माता-पिता के लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया था।

सुप्रीम कोर्ट से मिली इच्छामृत्यु की अनुमति

आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। बुधवार को सर्वोच्च अदालत ने हरीश राणा के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। कोर्ट के आदेश के बाद अब दिल्ली के एम्स अस्पताल में आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

यह फैसला हरीश के परिवार के लिए बेहद भावुक और दर्दनाक पल लेकर आया। एक तरफ बेटे को खोने का दुख है, तो दूसरी ओर इस लंबे कष्ट से उसे मुक्ति मिलने की उम्मीद भी।

13 वर्षों का लंबा और दर्दभरा संघर्ष

करीब 13 साल तक हरीश राणा और उनका परिवार एक कठिन दौर से गुजरता रहा। माता-पिता के सामने ऐसी स्थिति आ गई थी जहां उन्हें अपने बेटे के लिए मौत को ही राहत का रास्ता मानना पड़ा।

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