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5 द‍िन पहले त्याग दिया था शरीर, लेकिन अभी भी जिंदा होने का होता है एहसास

हिन्दू एवं बौद्ध अनुयायियों में अपनी विशेष पहचान रखने के साथ-साथ देश-विदेश में विख्यात रहे जिगर बौद्ध मंदिर रिवालसर के प्रमुख लामा बागडोर रिम्पोछे उर्फ ओंगदू को शरीर छोड़े हुए 5 दिन बीत चुके हैं

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Tue, 24 Sep 2019 10:35:11

5 द‍िन पहले त्याग दिया था शरीर, लेकिन अभी भी जिंदा होने का होता है एहसास

हिन्दू एवं बौद्ध अनुयायियों में अपनी विशेष पहचान रखने के साथ-साथ देश-विदेश में विख्यात रहे जिगर बौद्ध मंदिर रिवालसर के प्रमुख लामा बागडोर रिम्पोछे उर्फ ओंगदू को शरीर छोड़े हुए 5 दिन बीत चुके हैं। वह 18 सितंबर को सुबह 2:52 बजे अपनी देह का त्याग कर समाधि में लीन हो गए थे। समाधि में लीन लामा के शरीर को बिना बर्फ के रखा हुआ है तथा शरीर पर किसी प्रकार के केमिकल का लेप नहीं किया हुआ है। वही देश-विदेशों के साथ दूर-दराज क्षेत्रों से लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए रिवालसर पहुंचना शुरू हो गए हैं। लेकिन दर्शन करने वालों को ऐसा लगता है कि लामा जी अभी उठ खड़े हो जाएंगे। हैरानी की बात है कि लामा का शरीर बिल्कुल तरोताजा लगता है तथा उनके जिंदा होने का एहसास होता है। हालांकि उन्हें शरीर छोड़े हुए 5 दिन बीत चुके हैं।

लामा बागडोर रिम्पोछे ति‍ब्ब‍त‍ियों के साथ हिंदुओं की भलाई वाले कार्यों में हरदम तत्पर रहते थे। करीब 87 वर्ष की आयु में अकस्मात देह छोड़ने से स्थानीय लोग व भक्त खुद को बेसहारा महसूस कर रहे हैं। लामा के देह त्याग के बाद देश-विदेशों से आए लामा लोग लगातार पूजा-पाठ कर रहे हैं।

5 द‍िन पहले त्याग दिया था शरीर, लेकिन अभी भी जिंदा होने का होता है एहसास

दाह संस्कार को लेकर जिगर मूर्ति बौद्ध मन्दिर का कामकाज देख रहे याप मिनचुंग दोरजे व अनी केलसंग ने बताया कि लामा बागडोर रिम्पोछे का शरीर अपने आप जब तक दाह संस्कार का अहसास नहीं कराएगा, तब तक पूजा पाठ का क्रम चलता रहेगा तथा शरीर को इस अवस्था में रखा जाएगा। उचित समय आने पर दाह संस्कार होगा।

लामा बागडोर रिम्पोछे के जीवन के बारे में उनकी प्रिय शिष्य लीना जो अमेरिका से हैं तथा लामा के देह त्याग के बाद इंडिया रिवालसर आई हुई हैं। उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि लामा जी सिद्धपुरुष थे। उनका जन्म तिब्बत के खम प्रांत स्थित जिगर में 20 फरवरी 1932 में हुआ था। वर्ष 1958 में वह तिब्बत छोड़ अपने गुरु टुकसी रिम्पोछे, जो बीमार थे तथा चल फिर नहीं सकते थे, को अपनी पीठ पर उठाकर पहाड़ों को लांघते हुए यहां पहुंचे थे।

5 द‍िन पहले त्याग दिया था शरीर, लेकिन अभी भी जिंदा होने का होता है एहसास

रिवालसर स्थित सरकी धार पहाड़ी पर कई वर्षों तक अकेले तपस्या में लीन रहे वह बहुत बड़े तपस्वी व सिद्धपुरुष थे। जब स्वप्न के माध्य्म से उन्हें इस पहाड़ी व उनके दर्शन हुए तो वह उन्हें ढूंढती हुई यहां पहुंची थी तथा उसके बाद उनसे बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की और वर्षों उनकी सेवा की। उनके आज भी देश-विदेशों में हजारों अनुयायी रहे हैं।

लामा रिम्पोछे का सपना रिवालसर में बहुत बड़ा भव्य मंदिर व भगवान गुरु पद्मसम्भव की मूर्ति बनाने का था जिसको उन्होंने अपने जीवन काल मे पूरा किया। मूर्ति पर करोड़ों की धन राशि खर्च हुई है जिसको देखने देश-विदेश से लोग यहां चले आते हैं।

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