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'यूपी की बहू' शीला दीक्षित के जीवन की कुछ खास बातें, ऐसा रहा राजनीतिक सफर

शीला दीक्षित दिल्ली में सबसे लम्बे समय तक काम करने वाली मुख्यमंत्री रही थीं। शीला दीक्षित करीब 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और उसके बाद उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया था।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Sat, 20 Jul 2019 6:01:42

'यूपी की बहू' शीला दीक्षित के जीवन की कुछ खास बातें, ऐसा रहा राजनीतिक सफर

दिल्ली में विकास को नया आयाम देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का 81 साल की उम्र में आज निधन हो गया। राजधानी के एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। शीला दीक्षित दिल्ली में सबसे लम्बे समय तक काम करने वाली मुख्यमंत्री रही थीं। शीला दीक्षित करीब 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और उसके बाद उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया था। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं ने शोक जताया। एस्‍कॉर्ट फो‍र्ट‍िस अस्‍पताल के डायरेक्‍टर डॉ अशोक सेठ के अनुसार, शीला दीक्षि‍त की देखभाल डॉक्‍टरों की एक टीम द्वारा की जा रही थी। शाम 3:15 पर उन्‍हें कार्ड‍ियक अरेस्‍ट (दिल की गति रुकना) के कारण वेंटीलेटर पर भेजा गया। 3:55 पर उन्‍होंने अंतिम सांस ली। दिल्ली का कायाकल्प करने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। अपने कुशल नेतृत्व और तजुर्बे से उन्होंने पार्टी को नए मुकाम तक पहुंचाया।

शीला दीक्षित का परिचय

कांग्रेस की कद्दावर नेता रहीं शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ। उन्होंने दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की। शीला दीक्षित युवावस्था से ही राजनीति में रुचि लेने लगी थीं। उनका विवाह उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (आईएएस) विनोद दीक्षित से हुआ था। विनोद कांग्रेस के बड़े नेता और बंगाल के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय उमाशंकर दीक्षित के बेटे थे। विनोद से उनकी मुलाकात दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की पढ़ाई करने के दौरान हुई थी। उन्हें 'यूपी की बहू' भी कहा जाता है। शीला दीक्षित के दो संताने हैं। उनके पुत्र संदीप दीक्षित भी सांसद रह चुके हैं।

ससुर से सीखे राजनीति के गुर

उमाशंकर दीक्षित कानपुर कांग्रेस में सचिव थे। पार्टी में धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ती गई और वे पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू के करीबियों में शामिल हो गए। 1969 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाला गया तो उनका साथ देने वालों में उमाशंकर दीक्षित शामिल थे। जब इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई तो उमाशंकर दीक्षित उनकी वफादारी का इनाम मिला और वह 1974 में देश के गृहमंत्री बनाए गए। ससुर के साथ-साथ शीला भी राजनीति में उतर गईं। एक रोज ट्रेन में सफर के दौरान उनके पति की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। 1991 में ससुर की मौत के बाद शीला ने उनकी विरासत को पूरी तरह संभाल लिया।

शीला दीक्षित जल्द ही गांधी परिवार के भरोसेमंद साथियों में शुमार हो गईं। इसका उन्हें इनाम भी मिला। वह 1984 में कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ीं और संसद पहुंच गईं। राजीव गांधी कैबिनेट में उन्हें संसदीय कार्यमंत्री के रूप में जगह मिली। बाद में वह प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री भी बनीं।

राजीव गांधी के निधन के बाद सोनिया गांधी ने भी उनके ऊपर पूरा भरोसा जताया। 1998 में उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का चीफ बनाया गया। तब भी कांग्रेस की हालत बेहद पतली थी। कांग्रेस के टिकट पर वह पूर्वी दिल्ली से चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन बीजेपी के लाल बिहारी तिवारी ने उन्हें शिकस्त दी। बाद में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने जोरदार जीत हासिल की और वह मुख्यमंत्री बन गईं।

2013 में उन्हें आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के हाथों शिकस्त मिली। हार के बाद वे राजनीति में एक तरह से दरकिनार कर दी गईं। बाद में उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और दिल्ली लौट आईं।

इसके बाद उन्होंने दमदार वापसी की और पूर्व कांग्रेस चीफ राहुल गांधी ने भरोसा जताते हुए उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी। 2019 लोकसभा चुनावों में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि कांग्रेस और आप का गठबंधन हो जाए। लेकिन शीला दीक्षित ने इसका खुलकर विरोध किया और आखिरकार उनकी ही मानी गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को उत्तर-पूर्वी दिल्ली से अपना उम्मीदवार बनाया था। लेकिन बीजेपी के मनोज ने तिवारी ने दीक्षित को उत्तर-पूर्वी दिल्ली से करीब 3.66 लाख वोटों से हरा दिया था।

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