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कारगिल विजय दिवस: 'मरने' के बाद जी उठा था कारगिल का यह योद्धा, बना लाखों लोगों की प्रेरणा

26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इस दिन को हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जांबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर देशवासी को गर्व होना चाहिए।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Tue, 23 July 2019 3:00:20

कारगिल विजय दिवस: 'मरने' के बाद जी उठा था कारगिल का यह योद्धा, बना लाखों लोगों की प्रेरणा

कारगिल युद्ध (Kargil War) जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है। पाकिस्तान की सेना और कश्मीरी उग्रवादियों ने भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पार करके भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। पाकिस्तान ने दावा किया कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। लगभग 30,000 भारतीय सैनिक और करीब 5,000 घुसपैठिए इस युद्ध में शामिल थे। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर हमला किया और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से पाकिस्तान को सीमा पार वापिस जाने को मजबूर किया। यह युद्ध ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और दोनों देशों की सेनाओं को लड़ने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कारगिल युद्ध को 20 साल गुजर चुके हैं। ऐसे में आपको एक ऐसे वीर योद्धा की गाथा बताने जा रहे हैं, जो मरने के बाद जी उठे थे और आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं।

इस वीर बहादुर का नाम है मेजर डीपी सिंह। इन्हें फर्स्ट इंडियन ब्लेड मैराथन रनर के नाम से भी पहचाना जाता है। इनके पुनर्जन्म की कहानी दिलचस्प है। डीपी सिंह हर साल 15 जुलाई को अपना पुनर्जन्म दिवस मनाते हैं। अभी वे 45 साल के हो चुके हैं, लेकिन जिंदगी के 19 साल कुछ दिन पहले ही पूरे किए हैं।

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कारगिल के युद्ध में डीपी सिंह बुरी तरह से घायल हो गए थे। उनका एक पैर भी कट चुका था। इलाज के दौरान उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, लेकिन वह जी उठे। खुद डीपी सिंह बताते हैं कि 1999 की बात है ये। करगिल युद्ध चल रहा था। एक ब्लास्ट हुआ। आठ किलोमीटर तक मेरे साथी मारे गए उनके शव मेरी आंखों के सामने थे। मैं डेढ़ किलोमीटर ही दूर था। खून में सना हुआ था मैं। एक पैर तो वहीं गंवा चुका था। शरीर पर 40 गहरे घाव थे।

उन्होंने बताया कि मेरे साथी अपनी जान दांव पर लगाकर मुझे वहां से ले गए। बीच में पाक ऑक्यूपाइड नदी आई। एक साथी को ठीक से तैरना भी नहीं आता था। फिर भी उन्होंने मुझे अस्पताल पहुंचाया। किसी भी क्षण उन्हें गोली लग सकती थी, लेकिन उन्होंने मुझे यूं नहीं छोड़ा। डॉक्टर ने तो मुझे डेड डिक्लेयर कर दिया था। डीपी सिंह कहते हैं कि मेरी किस्मत में जीना लिखा था। उसी दिन एक सीनियर डॉक्टर हॉस्पिटल के दौरे पर थे और उनकी कोशिशों से मेरे शरीर में जिंदगी लौटी। वही से नई जिंदगी शुरू हुई। तब से हर 15 जुलाई को मैं अपना मृत्यु व जन्म दिवस मनाता हूं।

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मेजर कहते हैं कि मैंने इस नई जिंदगी की शुरुआत एक बच्चे की तरह की थी, लेकिन यात्रा कठिन थी। क्योंकि यहां कोई हाथ थामकर चलना सिखाने वाला नहीं था। पर मैंने खुद को सिर्फ जख्मों से उबरा, बल्कि 2009 में कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखा। बता दें कि इसके बाद मेजर ने कृत्रिम पैर के सहारे मैराथन में दौड़ना शुरू किया। 21 किमी हॉफ मैराथन दौड़कर इतिहास बनाया और देश में उनसे पहले किसी ने ऐसा नहीं किया था। वह तीन मैराथन में हिस्सा भी ले चुके हैं।

मेजर सिंह दो बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करा चुके हैं। सेना ने कृत्रिम पैर दिलाए, जिन्हें हम ‘ब्लेड प्रोस्थेसिस’ कहते हैं। इस कृत्रिम पैर का निर्माण भारत में नहीं होता और ये पश्चिमी देशों से मंगाने पड़ते हैं। मेजर सिंह एक संस्था चला रहे हैं- ‘दि चैलेंजिंग वंस’। साल 2011 में अपने जैसे कुछ लोगों के साथ मिलकर मेजर डीपी सिंह ने 'द चैलेंजिंग वन्स' नामक ग्रुप बनाया। वर्तमान में इस ग्रुप से करीब 800 के करीब लोग जुड़े हैं, जिनमें 90 सदस्य दौड़, स्वीमिंग, राइडिंग व पैरा ओलंपिक आदि में हिस्सा ले रहे हैं।

बता दे, 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इस दिन को हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जांबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर देशवासी को गर्व होना चाहिए। करीब 18 हजार फीट की ऊँचाई पर कारगिल में लड़ी गई इस जंग में देश ने लगभग 527 से ज्यादा वीर योद्धाओं को खोया था वहीं 1300 से ज्यादा घायल हुए थे।

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