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आज के समय में हम सभी को दाल-रोटी के लिए मेहनत करनी है: अमिताभ बच्चन

एक लंबे समय से कानों में यह कडक़ आवाज एक खास तरह की गूंज पैदा कर रही है। यह देश की सर्वाधिक मूल्यवान, भारी-भरकम बुलंद आवाज है, अकेली और अनोखी

Posts by : Geeta | Updated on: Mon, 11 Mar 2019 6:53:25

आज के समय में हम सभी को दाल-रोटी के लिए मेहनत करनी है: अमिताभ बच्चन

एक लंबे समय से कानों में यह कडक़ आवाज एक खास तरह की गूंज पैदा कर रही है। यह देश की सर्वाधिक मूल्यवान, भारी-भरकम बुलंद आवाज है, अकेली और अनोखी। जब वह अपनी नई थ्रिलर ‘बदला’ का एक संवाद बोलते हैं, दमदार आवाज वातावरण में गूंज उठती है -‘मैं वो 6 देखूं जो तुम दिखा रही हो या वो 9 जो मुझे देखना है’। इस आवाज की अपनी एक खासियत है। इसे सजाने-संवारने के लिए किसी और तकनीक की जरूरत नहीं है। अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) और उनके शिल्प ने कई पीढिय़ों पर राज किया है। इस फिल्मोद्योग में वह 50 साल पूरे कर चुके हैं। अमिताभ (Amitabh Bachchan) ने आईएएनएस के साथ साक्षात्कार के दौरान सबसे पहले उस एक घटना को लेकर संदेश दिया, जिसने उन्हें हाल ही में अपार पीड़ा पहुंचाई है। ‘सबसे पहले भरे दिल से हम पुलवामा हमले में शहीद हुए अपने वीर जवानों के लिए और हर क्षण हमारी सुरक्षा के लिए लडऩे वाले बहादुर जवानों के लिए शोक संवेदना जाहिर करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।’

साक्षात्कार के दौरान कई ऐसे तथ्य रहे, जिनपर हमारे समय के सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म स्टार ने ठंडे, सुस्त जवाब दिए, लेकिन उनकी विनम्रता हमेशा बनी रही। स्पष्ट कहा जाए तो उनके लिए आभा और प्रशंसा कोई मायने नहीं रखती। हालांकि दूसरे लोग, उनके प्रशंसक कुछ और सोच सकते हैं। विशेषण, अतिशयोक्ति और शब्दाडंबर उनके रास्ते में आए, लेकिन उन्होंने उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। अभी भी लोग उनके मुरीद हैं। उनके भीतर का इंकलाब (उनके जन्म के समय पिता हरिवंश राय बच्चन ने उन्हें यह नाम दिया था, लेकिन बाद में बदलकर अमिताभ कर दिया) अभी भी शांत नहीं पड़ा है, और एक अभिनेता के रूप में उनकी तलाश अभी भी जारी है।

ऐसे अमिताभ से हुई बातचीत के खास अंश इस प्रकार हैं —


प्रश्न — आप 50 साल की अपनी इस यात्रा को किस रूप में देखते हैं। जब अब्बास साहब आपको कलकत्ता से लेकर आए थे और ‘सात हिंदुस्तानी’ में से एक किरदार के लिए उन्होंने आपको चुना था। और अब यह यात्रा सुजॉय घोष और ‘बदला’ तक पहुंच चुकी है।

उत्तर — एक दिन के बाद दूसरा दिन और उसी तरह दूसरा काम। लेकिन मैंने अतीत में सुजॉय के साथ काम किया है। कहानी और निर्देशक मुझे पसंद है, कहानी में जो सस्पेंस और थ्रिल है, उसने मुझे प्रभावित किया। सुजॉय ने कहानी बनाई है और वह बेचैन हैं। वह अपने कलाकारों से परफेक्शन चाहते हैं, वह अपनी विचार प्रक्रिया को लेकर और उसे साकार करने को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। वह सिनेमा के व्याकरण की बहुत अच्छी समझ रखते हैं।

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प्रश्न — आप ने महान निर्देशकों और अभिनेताओं के साथ काम किया है। क्या आप मानते हैं कि ऋषिकेश मुखर्जी और प्राण आप के पसंदीदा रहे हैं। दोनों अलग-अलग तरीके से आपके लिए भाग्यशाली थे। आप ने ऋषिकेश मुखर्जी के साथ 10 फिल्में कीं।

उत्तर — जिस भी निर्देशक, अभिनेता, लेखक, निर्माता, सहकर्मी के साथ मैंने काम किया, सभी मेरे लिए पसंदीदा रहेंगे।

प्रश्न — तमाम शीर्ष अमेरिकी अभिनेताओं ने ली स्ट्रासबर्ग के अभिनय के तरीके को अपनाया है, जिन्हें हमने ‘गॉडफादर 2’ में हायमन रोथ के रूप में देखा था, जिनके साथ उनके शिष्य अल पैसिनो ने काम किया था, यह दिलचस्प फिल्म थी। जब आप अभिनय की दुनिया में आए तो क्या आपने अभिनय का कोई प्रशिक्षण लिया या किसी की शैली को अपनाया या किसी ने आपके काम पर असर डाला।

उत्तर — बिल्कुल नहीं, मैंने अभिनय का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया, और न तो मैंने जाने-अनजाने किसी की नकल की, जब तक कि हमारे निर्माता-निर्देशक ने मुझसे वैसा करने के लिए नहीं कहा। और इस तरह के कुछ मौके आए। मुझे न तो अभिनय का कोई तरीका मालूम है और न तो मैंने कभी कोई बड़ी छलांग ही लगाई।

प्रश्न — हॉलीवुड में किसके काम को आप पसंद करते हैं। क्रिस्टोफर प्लमर चिरयुवा हैं और लगता है अच्छा कर रहे हैं..वही स्थिति क्लिंट ईस्टवुड की है, लेकिन ज्यादातर निर्देशक के रूप में।

उत्तर — मार्लन ब्रांडो, मोंटगोमरी क्लिफ्ट, जेम्स डीन..

प्रश्न — इन दिनों रणवीर सिंह अपने किरदारों को बेहतरीन तरीके से जी रहे हैं। हमारा मानना है कि आपकी कई भूमिकाओं के लिए काफी तैयारी की जरूरत रही होगी, उदाहरण के लिए ‘पा’ या ‘ब्लैक’ में। इस तरह के कठिन किरदारों के लिए अपने शिल्प के बारे में कुछ बताएंगे।

उत्तर — मेरे पास कोई शिल्प नहीं है और न तो यही पता है कि दूसरे लोग अच्छा काम करने के लिए क्या और कैसे करते हैं। मैं लेखक के लिखे शब्दों और निर्देशक के निर्देशों का यथासंभव सावधानी से अनुसरण करता हूं। ‘ब्लैक’ के लिए हमने दिव्यांगों की सांकेतिक भाषा सीखी। ‘बदला’ एक अलग तरह की थ्रिलर है। थ्रिलर वर्षों से आज भी हमें बांध कर रखती है। मेरी पीढ़ी के कुछ लोगों की स्मृतियों में ‘महल’ आज भी जिंदा है। 1949 की इस फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला ने काम किया था और इसका संगीत मौलिक था। दोनों हिंदी सिनेमा के मजबूत ताने-बाने का हिस्सा रहे हैं। (अमिताभ ने भी अपने शुरुआती समय में दो बहुत जोरदार सस्पेंस थ्रिलर ‘परवाना’ और ‘गहरी चाल’ में काम किया था)।

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प्रश्न — आप ने हमेशा कहा है अपने अभिनय करियर में आप भाग्यशाली रहे हैं। क्या यह पंक्ति आपके जीवन का मूलमंत्र है- मैं अकेला ही चला जा रहा था, लोग जुड़ते चले गए और कारवां बनता चला गया।

उत्तर — अपने पेशे में मूलमंत्र का अर्थ मुझे नहीं पता.. मुझे नहीं पता कि मैं भाग्यशाली रहा हूं।

प्रश्न — आपके शिखर के वर्षों के एक बड़े हिस्से के दौरान मीडिया के साथ आपका एक बहुत ही कठिन रिश्ता रहा है। एक समय मीडिया ने आपका बहिष्कार तक कर दिया था और आज मीडिया के साथ आपका बहुत अच्छा रिश्ता है। इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे और आपने इस दूरी को पाटने के लिए क्या कुछ किया।

उत्तर —
मैं समझता हूं कि आपको यह अच्छी तरह पता है कि कोई भी व्यक्ति न तो मीडिया के बहुत करीब रह सकता है और न बहुत दूर ही। मीडिया चौथा स्तंभ है, देश की अंतरात्मा है। मेरे पास अपनी अंतरात्मा के साथ जीने की क्षमता या दुस्साहस है, लेकिन मीडिया के साथ नहीं। इसके बारे में सोचना मेरे लिए मूर्खता होगी।

प्रश्न —
फिल्मोद्योग में 50 साल हो चुके हैं, फिर भी आपके भीतर का कलाकार उसी तरह जिंदा और सक्रिय है। आपको ऊर्जा कहां से मिलती है या यह काम के प्रति सम्मान की भावना है, जो आपकी अतंर्निहित नैतिकता को परिभाषित करती है।

उत्तर — मुझे समझ में नहीं आता कि आप या अन्य कई लोग मुझसे यह सवाल क्यों पूछते हैं।

प्रश्न — 'सात हिंदुस्तानी' के बाद के वर्षों में कई फिल्में असफल हुईं, लेकिन किसी मौलिक काम, सुनील दत्त की ‘रेशमा और शेरा’ की छोटी-सी भूमिका, या ‘आनंद’ से पहले की किसी फिल्म के अनुभव को याद करना चाहेंगे।

उत्तर — सिर्फ यही इच्छा रहती थी कि कोई दूसरा काम मिले। अधिकांश बार असफलता ही मिली।

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प्रश्न — क्या स्कूल में आपने कोई शेक्सपियर किया। आपकी आवाज और अभिनय में कही-कहीं नाटकीयता की झलक है, जो आपकी हाल की फिल्मों में उभरकर सामने आई है।

उत्तर — नहीं, स्कूल में कभी भी शेक्सपियर नहीं किया।

प्रश्न — अभिनय करते हुए आपको 50 साल पूरे हो चुके हैं। क्या ‘विजय’ के अलावा कोई किरदार है, जो आपके जहन में जिंदा हो, और क्यों।

उत्तर — नहीं ऐसा कोई नहीं है।

प्रश्न — क्या हिंदी सिनेमा नई पीढ़ी के युवा निर्देशकों और अभिनेताओं के साथ अच्छे हाथों में है। जैसे रणवीर सिंह, आयुष्मान खुराना, आलिया भट्ट, राजकुमार या गली बॉय का ‘शेर’ साधारण कहानियां कह रहे हैं, जो लोगों को पसंद आ रही हैं। बॉयोपिक या जीवन की सच्ची कहानियां अच्छा कर रही हैं। अक्षय ने इस ऑर्ट फॉर्म को आकार दिया है, आप भी नागराज मंजुल के साथ ‘झुंड’ कर रहे हैं। क्या यह स्थिति मौलिक स्क्रिप्ट के अभाव के कारण है या ऐसी कहानियां समय की मांग हैं।

उत्तर — समय और परिस्थितियां बदल गई हैं। हर पेशे में बदलाव आया है। फिल्म कोई अलग नहीं है। मौजूदा पीढ़ी अविश्वसनीय प्रतिभा से भरी हुई है। मैं इस पीढ़ी से बहुत प्रभावित हूं और मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे इनमें से कुछ के साथ काम करने का मौका मिला है। यह मेरे लिए सीखने जैसा है। वे एक अलग और वैकल्पिक दुनिया के दृष्टिकोण मुहैया कराते हैं और यह सीखने लायक है। आज के मनोरंजन जगत के लेखकों और निर्माताओं की विश्वसनीयता, निपुणता, बुद्धिमानी और कौशल को कभी कम मत आंकिए। वे पिछले 100 सालों से अधिक समय से हमारी रचनात्मकता के पुष्पित और पल्लवित होने के प्रमाण हैं। 100 साल बाद भी अर्थवान बने रहना और खड़े रहना कोई मजाक नहीं है। यह सम्मान लायक है। मौलिकता एक द्वंद्वात्मक शब्दावली है। इसका बहुत सावधानी से इस्तेमाल करने की जरूरत है।

प्रश्न — क्या आपको यह सच्चाई परेशान करती है कि आज के अभिनेता अपनी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए काफी मेहनत करते हैं और उसमें काफी समय और ऊर्जा लगाते हैं, जबकि आपके समय में ऐसा नहीं था, जब आप निर्विवाद शहंशाह थे। ये सारी चीजें क्यों और कैसे बदल गईं।

उत्तर — आप कहीं भी देखिए, महोदय, यह स्थिति सिर्फ अभिनेताओं के साथ नहीं है। बल्कि क्या आज के समय में हर कोई अपनी दाल-रोटी के लिए मेहनत नहीं कर रहा है।

प्रश्न — आपके समय में एक कलाकार की साल में आठ फिल्में रिलीज होती थीं। आज अभिनेता साल में या दो साल में एक फिल्म करते हैं। क्या यह नए युग के व्यवसाय का तरीका है।

उत्तर — यह बेहतर प्रबंधन को एक मान्यता है, वित्तीय और व्यक्तिगत दोनों को। अच्छी बात यह है कि संगीत और मेलोडी हिंदी सिनेमा में वापस लौट आए हैं। हर कोई संगीत का आनंद ले रहा है। संगीत हमारी आत्मा को छू रहे हैं।

प्रश्न — समानांतर सिनेमा के समय से लेकर छोटे सिनेमा तक, जैसे ‘राजी’ और ‘बधाई हो’ विशुद्ध मनोरंजक (व्यवसायिक) सिनेमा से टक्कर ले रही हैं। क्या हिंदी फिल्मों के दर्शकों की रुचि बदल गई है, या व्यवसायिकता की ही परिभाषा बदल गई है।

प्रश्न — मुझे नहीं पता ‘व्यवसायिक’ या ‘समानांतर’ क्या है। सिनेमा सिर्फ सिनेमा है। आकार और परिधि, छोटा-बड़ा कपड़े नापने के पैमाने हैं। दुनिया के हर कोने में हर पीढ़ी की रुचि बदल गई है, सिर्फ फिल्म में ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में।

प्रश्न — ‘गिरफ्तार’ की कोई स्मृति। शायद यह पहली फिल्म है, जिसमें रजनीकांत, कमल हासन और आप ने एकसाथ काम किया है।

उत्तर — यह एक समय था, अवसर था और एक सबसे सुखद अनुभव था, एक ही फिल्म में रजनी और कमल के साथ।

(इनपुट आईएएनएस से साभार)

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