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  • Movie Review : सशक्त विषय के बावजूद निर्देशक की कमजोरी से आम फिल्म बनकर रह गईं ‘द एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर’ और ‘उरी’

Movie Review : सशक्त विषय के बावजूद निर्देशक की कमजोरी से आम फिल्म बनकर रह गईं ‘द एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर’ और ‘उरी’

By: Rajesh Fri, 11 Jan 2019 3:35 PM

Movie Review : सशक्त विषय के बावजूद निर्देशक की कमजोरी से आम फिल्म बनकर रह गईं ‘द एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर’ और ‘उरी’

वर्ष की शुरुआत में एक साथ तीन फिल्मों के प्रदर्शन ने दर्शकों को असमंजस में रखा जिसके चलते तीनों फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक शुरूआत मिली है। काफी जद्दोजहद के बाद इनमें से दो फिल्में देखने का मानस बनाया लेकिन जब इन फिल्मों को देखा तो इस बात का अहसास हुआ कि इन दोनों फिल्मों के विषय को इसके निर्देशक सशक्तता के साथ परदे पर उतारने में नाकामयाब रहे हैं। हालांकि दोनों ही विषय बेहद संजीदा और चर्चित रहे हैं। आइए डालते हैं एक नजर इन दोनों फिल्मों पर बतौर समीक्षक—

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द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर

कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने मनमोहन सिंह के साथ बिताए दिनों को किताब के रूप में लिखा और इसी पर निर्माता सुनील बोहरा ने फिल्म का निर्माण किया। फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है वह कितना सच और कितना झूठ इस बात का पता सिर्फ मनमोहन और संजय बारू को है। लेकिन संजय बारू की किताब को पीएमओ झुठला चुका है। फिल्म देखते हुए इस बात का अहसास भी हो जाता है कि संजय बारू की किताब पूरा सच नहीं दिखाती है और निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे ने इसमें कुछ अपना तडक़ा भी लगाया है, जो किसी बॉयोपिक के लिए आवश्यक नहीं है।

यह फिल्म निर्देशक के लिए बड़ा मौका थी, यदि इस फिल्म को कोई संजीदा और मंझा हुआ निर्देशक निर्देशित करता तो निश्चित तौर पर यह बेहतरीन फिल्म बन सकती थी। निर्माता ने फिल्म के शुरूआत में ही इस बात दिखाया है कि फिल्म मनोरंजन के लिए बनाई गई है, कुछ कल्पनाएँ जोड़ी गई हैं, जिससे फिल्म की गम्भीरता पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त फिल्म में ऐसा कोई खुलासा नहीं है जो आम जनता को मालूम न हो। इसके साथ ही फिल्म गहराई में भी नहीं जाती है। राजनीति के क्षेत्र में मनमोहन सिंह को जीनियस कहा जाता है, लेकिन विजय रत्नाकर ने पूरी फिल्म में उन्हें मजबूर और बेबस व्यक्ति के रूप में पेश किया है। इससे ज्यादा यह फिल्म संजय बारू को मनमोहन सिंह पर हावी बताती है, स्पष्ट होता है कि संजय बारू ने यह किताब मनमोहन सिंह पर न लिखकर स्वयं का बखान करने के लिए लिखी हो कि इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री उन पर कितना निर्भर करता था। मध्यान्तर से पूर्व तक विजय जहाँ फिल्म पर पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे हैं, लेकिन मध्यान्तर के बाद वे फिल्म में ऐसा कोई दृश्य या पकड़ नहीं रख पाए जिससे उत्सुकता बनी रहे। दर्शक मध्यान्तर के बाद बोरियत महसूस करता है।

बात करें अभिनय की तो मनमोहन सिंह के गेटअप में अनुपम खेर पूरी तरह से मनमोहन सिंह नहीं लगते हैं, विशेष रूप से उनकी जो चाल बताई गई है वह मनमोहन से मेल नहीं खाती है। हालांकि उनका अभिनय अच्छा है। उन्होंने अपने चेहरे के हावभाव से मनमोहन सिंह की मजबूरी और झटपटाहट को गंभीरता से व्यक्त किया है। इसके अतिरिक्त संजय बारू के रूप में परदे पर आए अक्षय खन्ना कई दृश्यों में ओवर एक्टिंग का शिकार हो गए हैं। इसके बावजूद उनका अभिनय अनुपम खेर से ज्यादा अच्छा है। इन दोनों नामी सितारों के अतिरिक्त फिल्म में कई और चेहरे भी हैं, जिन्होंने अपनी-अपनी भूमिका के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। छायांकन औसत दरजे का है। फिल्म के संवादों की जरूर तारीफ करेंगे, लेकिन सेंसर बोर्ड ने कई संवादों पर कैंची चला दी है और कई जगह बीप का उपयोग किया गया है। इस फिल्म को उन्हीं दर्शकों का सराहा मिलेगा जो राजनीति में रूचि रखते हैं। आम दर्शक को इस तरह की फिल्म देखने का कतई शौक नहीं होगा।

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उरी

वास्तविक और चर्चित घटना पर बनी फिल्म ‘उरी’ को यह सोचकर देखने गए थे कि इसमें हमें वो थ्रिल देखने को मिलेगा, जिसे भारतीय सैनिकों ने उस समय महसूस किया होगा जब पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी। लेकिन फिल्म देचाने के बाद निराशा हाथ लगती है। सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई विवाद पैदा हुए लेकिन भारतीय जनता ने सरकार द्वारा मीडिया में दिए गए इस बाबत हर बयान को गंभीरता से लेते हुए भारतीय सेना की तारीफ की। निर्देशक आदित्य धर ने ‘उरी’ में इसी बात को दिखाने का प्रयास किया है लेकिन वे असफल हो गए हैं।

आम भारतीय जनता के दिलों में इस ऑपरेशन को लेकर कई सवाल थे, जिनके जवाबों की उम्मीद उन्हें इस फिल्म की घोषणा के बाद जगी थी। लेकिन फिल्म देखने के बाद निराशा हाथ लगती है। फिल्म के नाम पर इस घटनाक्रम को पेश करने में कई प्रकार की सहूलियत ली गई हैं। यह ऑपरेशन इतना आसान नहीं रहा होगा जितना इसे फिल्म में दिखाया गया है। इस ऑपरेशन की पूरी तैयारी की गई होगी, सेना को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा होगा लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है जिससे थ्रिल पैदा हो सके और दर्शकों में फिल्म देखने की इच्छा जागृत कर सके।

अभिनय की बात करें तो विक्की कौशल और परेश रावल ने अपने अभिनय से दर्शकों को रोमांचित किया है। यामी गौतम को जितना भी काम मिला है उन्होंने इसे ईमानदार से निभा दिया है।

पटकथाकार-निर्देशक आदित्य धर पटकथा में उन दृश्यों को लिखने में असफल रहे हैं जिससे इतने बड़े अभियान में रोमांच पैदा हो सके। इसके अतिरिक्त फिल्म के संवाद भी ऐसे नहीं हैं जो दर्शकों के दिलों को छु सकें और तालियों की गडग़ड़ाहट का माहौल पैदा कर सके। वास्तविक घटनाक्रम पर बनी इस फिल्म में वास्तविकता का भी अभाव नजर आता है।

कुल मिलाकर इन दोनों फिल्मों के लिए यही कहा जा सकता है कि इन फिल्मों के पटकथाकार और निर्देशक इन विषयों को उस तरह से प्रस्तुत करने में असफल रहे हैं, जिसकी इनको आवश्यकता थी।

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