
काठमांडू। नेपाल में पिछले दो दिनों से जारी उग्र विरोध प्रदर्शनों ने आखिरकार प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को झुकने पर मजबूर कर दिया। भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ भड़की युवाओं की जेन-जी आंदोलन लहर ने काठमांडू को हिंसा की आग में झोंक दिया और इसके बीच मंगलवार को ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसे जनता की ताकत और लोकतांत्रिक दबाव की जीत माना जा रहा है।
इस्तीफे से पहले की राजनीतिक हलचल
इस्तीफे से पहले ओली ने मंगलवार शाम सभी दलों की बैठक बुलाई थी। बैठक से पहले उन्होंने एक बयान जारी कर अपील की थी कि “मैं स्थिति का आकलन करने और एक सार्थक निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित पक्षों के साथ संवाद में हूं। इसके लिए मैंने आज शाम छह बजे सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है। मैं सभी भाइयों और बहनों से निवेदन करता हूं कि इस कठिन परिस्थिति में शांति बनाए रखें।” लेकिन हालात नियंत्रण से बाहर होते देख ओली ने आखिरकार पद छोड़ने का निर्णय लिया।
नेताओं के घरों पर हमले और संसद में आगजनी
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों का आक्रोश सिर्फ प्रधानमंत्री तक ही सीमित नहीं रहा। युवाओं ने कई शीर्ष नेताओं के घरों और सरकारी भवनों को निशाना बनाया। संसद भवन को आग के हवाले कर दिया गया, जबकि संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग के घर में भी प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी। उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बिष्णु पौडेल, नेपाल राष्ट्र बैंक के गवर्नर बिस्वो पौडेल और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक के आवासों पर भी पथराव हुआ।
विपक्षी नेताओं को भी नहीं बख्शा
प्रदर्शनकारियों ने मुख्य विपक्षी नेता और सीपीएन-एमसी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के आवास पर पथराव किया। इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के निवास तक भी प्रदर्शनकारी पहुंचे, हालांकि वहां सुरक्षा बलों ने उन्हें रोक लिया और बड़ी घटना होने से बचा लिया।
बढ़ते विरोध और सरकार की नाकामी
युवाओं का यह आंदोलन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ गुस्से का परिणाम माना जा रहा है। नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाया था, जिससे देशभर में असंतोष और तेज हो गया। सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के दबाव में सोमवार देर रात बैन हटाने का निर्णय तो लिया, लेकिन तब तक जनता का गुस्सा चरम पर पहुंच चुका था।
हिंसा और सुरक्षा बलों की कार्रवाई
काठमांडू, ललितपुर और अन्य जिलों में प्रदर्शनकारियों ने जमकर तोड़फोड़ और आगजनी की। सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव के दौरान पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लिया। इस हिंसा में अब तक कई लोगों के हताहत होने की खबरें हैं।
राजनीतिक भविष्य पर सवाल
ओली के इस्तीफे के बाद नेपाल का राजनीतिक भविष्य अनिश्चितताओं से घिर गया है। विपक्ष और सेना की सक्रियता के बीच सवाल यह है कि नेपाल में स्थिरता कैसे लौटेगी और नए प्रधानमंत्री का चयन कौन करेगा। वहीं, जनता का गुस्सा सिर्फ इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राजनीतिक सुधार और जवाबदेही की मांग भी कर रहे हैं।
नेपाल में unfolding घटनाक्रम यह साबित करता है कि लोकतांत्रिक देशों में जनता की आवाज सबसे बड़ी ताकत होती है। ओली का इस्तीफा आने वाले समय में राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए एक बड़ा सबक साबित हो सकता है।














