
आजकल लोग दिनभर में कई बार AI से सवाल पूछते हैं। जो काम पहले गूगल किया करता था, अब वही काम AI चैटबॉट्स तेजी और विस्तार से करने लगे हैं। किसी भी जिज्ञासा का तुरंत समाधान पाने के लिए लोग अब गूगल की जगह AI का सहारा लेना अधिक सुविधाजनक मानते हैं। वजह साफ है—AI अलग-अलग साइट्स खोलने की झंझट से बचाता है और सीधा, व्यवस्थित और गहराई से भरा जवाब देता है। लेकिन ताजा शोध यह चेतावनी देता है कि इन जवाबों पर पूरी तरह निर्भर होना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इनमें दी गई कुछ जानकारियों का ठोस स्रोत नहीं होता और उपयोगकर्ता आसानी से भ्रमित हो सकते हैं।
किन टूल्स की हुई जाँच?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेल्सफोर्स AI रिसर्च टीम के प्रणव नारायण वेंकट और उनके सहयोगियों ने हाल ही में यह अध्ययन किया। इस जांच में कई AI टूल्स और सर्च इंजन शामिल किए गए, जैसे OpenAI के GPT-4.5 और GPT-5, माइक्रोसॉफ्ट का बिंग चैट, यू.कॉम और परप्लेक्सिटी। इसके अलावा पाँच अन्य डीप रिसर्च टूल्स की भी पड़ताल की गई। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि ये टूल्स तथ्यात्मक रूप से कितने निष्पक्ष और सटीक हैं।
सवालों को दो श्रेणियों में बाँटा गया
टीम ने “डीपट्रेस” नामक सिस्टम का इस्तेमाल किया, जो आठ अलग-अलग मानकों पर जवाबों का विश्लेषण करता है। शोध के दौरान प्रश्नों को दो हिस्सों में बाँटा गया—पहले वे प्रश्न जिनसे यह पता चल सके कि जवाबों में किसी तरह का पक्षपात है या नहीं। दूसरे, ऐसे सवाल जो विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों से जुड़े थे, जैसे मौसम विज्ञान, चिकित्सा और कंप्यूटर-ह्यूमन इंटरैक्शन।
एक तिहाई जवाब निकले भ्रामक
रिसर्च के निष्कर्ष चौंकाने वाले रहे। पाया गया कि करीब एक-तिहाई AI टूल्स और सर्च इंजन गलत या पक्षपाती जानकारी दे रहे थे। उदाहरण के लिए, बिंग चैट के लगभग 23% जवाब ऐसे थे जिनके स्रोत पर भरोसा नहीं किया जा सकता था। यू.कॉम और परप्लेक्सिटी ने 31% बार बिना सबूत वाले दावे किए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि OpenAI के GPT-4.5 ने 47% मामलों में और परप्लेक्सिटी के डीप रिसर्च एजेंट ने 97.5% दावे बिना प्रमाण प्रस्तुत किए।
पहले भी उठे थे सवाल
AI की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर पहले भी चिंताएँ जताई जा चुकी हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ता फेलिक्स साइमन का मानना है कि यह अध्ययन एक बार फिर AI सिस्टम्स की सीमाएँ उजागर करता है। उनका कहना है कि ऐसे शोध भविष्य में इन खामियों को दूर करने में मददगार साबित हो सकते हैं। वहीं, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अलेक्सांद्रा उरमान ने इस रिसर्च के तरीकों पर सवाल खड़े किए और कहा कि निष्कर्षों को सावधानी से देखना होगा।














