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पश्चिम बंगाल में TMC की हार पर ओवैसी का दावा, ममता बनर्जी की पराजय के बताए 4 बड़े कारण

पश्चिम बंगाल में TMC की हार पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने भ्रष्टाचार, कुशासन, मुस्लिम समुदाय की उपेक्षा और SIR विवाद को ममता बनर्जी की चुनावी पराजय के चार प्रमुख कारण बताया।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Tue, 16 Jun 2026 5:15:32

पश्चिम बंगाल में TMC की हार पर ओवैसी का दावा, ममता बनर्जी की पराजय के बताए 4 बड़े कारण

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिली बड़ी हार के बाद राजनीतिक गलियारों में इसके कारणों को लेकर चर्चा तेज है। इसी बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने चुनावी नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया है कि ममता बनर्जी की पार्टी की पराजय किसी एक कारण से नहीं हुई, बल्कि कई गंभीर मुद्दों का परिणाम थी। उन्होंने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता, मुस्लिम समुदाय की उपेक्षा और SIR विवाद को TMC की हार के प्रमुख कारणों में शामिल किया।

ANI को दिए एक इंटरव्यू में ओवैसी ने कहा कि राज्य सरकार धीरे-धीरे आम लोगों की समस्याओं से दूर होती चली गई। जनता के बीच बढ़ती नाराजगी और भरोसे में आई कमी का असर आखिरकार चुनाव परिणामों में दिखाई दिया। उनके अनुसार तृणमूल कांग्रेस लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी, जिसका सीधा फायदा विपक्ष को मिला।

हार के पीछे बताए चार बड़े कारण

ओवैसी ने विस्तार से बताते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की पराजय के पीछे चार ऐसे मुद्दे रहे, जिन्होंने जनता की सोच को प्रभावित किया और चुनावी परिणामों की दिशा बदल दी।

1. भ्रष्टाचार के आरोप

AIMIM प्रमुख ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार से जुड़े कई आरोप लगे। विभिन्न मामलों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा। ओवैसी का मानना है कि इन आरोपों ने जनता के मन में सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया और लोगों के बीच असंतोष बढ़ाया। उन्होंने कहा कि चुनावों में मतदाताओं ने इसी नाराजगी को वोट के जरिए जाहिर किया।

2. प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल

ओवैसी ने राज्य में कुशासन को भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया। उनके मुताबिक सरकार प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। कई क्षेत्रों में लोगों को बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ा और सरकार उन चुनौतियों का प्रभावी समाधान देने में विफल रही। उन्होंने कहा कि जब जनता को लगता है कि शासन उनकी उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं कर रहा है, तो उसका असर सीधे चुनावी नतीजों पर पड़ता है।

3. मुस्लिम समाज की अनदेखी

ओवैसी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में बड़ी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद उनकी समस्याओं और आवश्यकताओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि चुनावी राजनीति में मुस्लिम समुदाय का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

उनके अनुसार सरकार ने समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम नागरिकों को भी समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए। ओवैसी ने दावा किया कि इस वर्ग में बढ़ती नाराजगी ने भी चुनावी परिणामों को प्रभावित किया।

4. SIR विवाद का असर

ओवैसी ने SIR मुद्दे को भी तृणमूल कांग्रेस की हार का अहम कारण बताया। उनका कहना था कि इस विवाद ने राज्य में व्यापक बहस और असंतोष को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि जनता के एक वर्ग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और इसका असर मतदान के दौरान देखने को मिला।

ओवैसी के मुताबिक इन चारों कारणों ने मिलकर ऐसा माहौल तैयार किया, जिसने तृणमूल कांग्रेस की चुनावी स्थिति को कमजोर कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि ममता बनर्जी की सरकार धीरे-धीरे जनता से संवाद खोती चली गई और लोगों की भावनाओं को समझने में असफल रही।

OBC प्रमाणपत्र विवाद पर भी उठाए सवाल

इंटरव्यू के दौरान ओवैसी ने ओबीसी प्रमाणपत्रों के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले का उल्लेख किया, जिसमें वर्ष 2010 के बाद जारी किए गए लगभग पांच लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया गया था।

ओवैसी ने दावा किया कि इनमें करीब तीन लाख प्रमाणपत्र मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों के थे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के पास इस मामले का समाधान निकालने और प्रभावित लोगों को राहत देने का अवसर था, लेकिन आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। उनके अनुसार इस मुद्दे ने भी प्रभावित वर्गों के बीच असंतोष को बढ़ाया।

विधानसभा चुनाव में भाजपा का दबदबा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 294 में से 206 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद फलता विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार को सफलता मिली, जिससे पार्टी की कुल सीटें बढ़कर 207 हो गईं।

वहीं, पिछली बार भारी बहुमत हासिल करने वाली तृणमूल कांग्रेस इस चुनाव में केवल 80 सीटों तक सीमित रह गई। चुनावी हार के बाद पार्टी को संगठनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा और कई नेताओं तथा विधायकों के असंतोष की खबरें सामने आने लगीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बदलाव राज्य के लिए एक नए दौर की शुरुआत का संकेत हो सकता है। हालांकि आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि तृणमूल कांग्रेस खुद को किस तरह पुनर्गठित करती है और विपक्ष की भूमिका में अपनी राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने के लिए क्या रणनीति अपनाती है।

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