
प्रयागराज में मौनी अमावस्या के स्नान पर्व के दौरान उपजे विवाद के बाद अब प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज़ हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम को सुलझाने के लिए शासन स्तर से प्रयास शुरू हो चुके हैं। जानकारी के अनुसार, माघ मेला क्षेत्र से प्रस्थान करने के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मनाने की ज़िम्मेदारी अब लखनऊ के वरिष्ठ अधिकारियों ने संभाल ली है। वे लगातार संपर्क साधकर माघी पूर्णिमा के अवसर पर संगम स्नान के लिए उन्हें राज़ी करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ से आए दो बड़े अधिकारी व्यक्तिगत रूप से शंकराचार्य से बातचीत कर रहे हैं और उन्हें माघी पूर्णिमा पर संगम में स्नान के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। हालांकि, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने रुख पर अब भी अडिग दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे किसी भी प्रकार की सहमति नहीं देंगे। शंकराचार्य की प्रमुख मांग है कि जिन अधिकारियों पर उनके बटुक शिष्यों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप हैं, वे सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
प्रशासन की मंशा है कि माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर शंकराचार्य संगम में स्नान करें, लेकिन फिलहाल इस पर उनकी ओर से कोई अंतिम स्वीकृति सामने नहीं आई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी शर्त रखी है कि चारों पीठों के शंकराचार्यों के संगम स्नान के लिए एक स्पष्ट और सम्मानजनक प्रोटोकॉल तैयार किया जाए। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि लखनऊ से आए अधिकारी उनकी अधिकांश शर्तों पर सहमति जता चुके हैं, जिसके चलते इस विवाद के समाधान की संभावनाएं अब बढ़ती हुई नजर आ रही हैं।
बताया जाता है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 28 जनवरी को दोपहर लगभग 12 बजे माघ मेला क्षेत्र छोड़ दिया था। इसके बाद वे काशी पहुंच गए, जहां वे अपने शिष्यों के साथ ठहरे हुए हैं। जानकारी के अनुसार, बीते दो दिनों से लखनऊ के ये अधिकारी लगातार उनके संपर्क में हैं और मेला क्षेत्र छोड़ने के बाद से ही उन्हें मनाने की प्रक्रिया लगातार जारी है।
गौरतलब है कि मौनी अमावस्या के दिन जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ संगम स्नान के लिए बढ़ रहे थे, तब प्रशासनिक अधिकारियों ने पालकी के साथ आगे बढ़ने से रोक दिया था। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। शंकराचार्य ने आरोप लगाया था कि उनके बटुक शिष्यों की चोटी खींची गई और उनके साथ मारपीट की गई। इस घटना से आहत होकर उन्होंने संगम स्नान नहीं किया और अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए थे। दूसरी ओर, प्रशासन भी अपने निर्णय पर अड़ा रहा। लगातार 11 दिनों तक चले धरने के बाद अंततः शंकराचार्य ने माघ मेला क्षेत्र छोड़ने का फैसला किया था।














