
करीब दो साल जेल में रहने के बाद बाहर आए आजम खान ने अपने राजनीतिक भविष्य और हाल के अनुभवों पर खुलकर बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उन्हें राजनीति से दूरी बना लेनी चाहिए थी, लेकिन अपनी खुदगर्जी ने उन्हें रोक लिया। आजम ने कहा कि रामपुर के हालात पिछले एक दशक में काफी बदल गए हैं और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने राजनीति में बने रहने का विकल्प चुना।
आजम खान ने कहा, “मुलायम सिंह यादव के जाने के बाद राजनीति छोड़ देनी चाहिए थी, लेकिन मैं खुदगर्ज हो गया। वजह थी कि लोगों का दर्द आंखों में था और कई अधूरे काम थे। उन अधूरे कामों को पूरा करने की चाह ने मुझे कई बार मुश्किल हालात में डाल दिया।” उन्होंने अपने बचपन और राजनीतिक संघर्ष की तुलना ऐतिहासिक घटनाओं से की। आजम ने बताया कि वे नवाबों से लड़कर आए हैं और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामपुर के नवाबों की सेना ने मेरठ के आजादी के योद्धाओं को रोका था।
समाजवादी पार्टी से अलग होकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में जाने के कयासों को आजम खान ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “ये केवल बचपने की बातें हैं। मैंने पहले भी सपा नहीं छोड़ी, बल्कि मुझे मजबूरी में बाहर किया गया। मुलायम सिंह यादव ने मुझे मजबूरी में पार्टी से निकाला और फिर मोहब्बत में वापस लिया। हमारा रिश्ता हमेशा विशेष रहा है।”
आजम खान की राजनीतिक यात्रा जेल की सलाखों के भीतर लगभग पांच वर्षों तक रही। अब जेल से बाहर आने के बाद वे एक बार फिर रामपुर में चर्चा का केंद्र बन गए हैं। समाजवादी पार्टी के शासन में भी रामपुर हमेशा उनके राजनीतिक प्रभाव का केंद्र रहा। मुसलमान वोट बैंक और बेबाक अंदाज के चलते आजम खान लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं और उनकी बातों और फैसलों पर हमेशा निगाहें टिकी रहती हैं।














