
लोकसभा में मंगलवार को ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले को लेकर चर्चा का दूसरा दिन भी खासा गरम रहा। इस बहस में समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जमकर निशाना साधा। अपनी बात की शुरुआत उन्होंने एक गहरे व्यंग्य से की और कहा, "मैं दुनिया को मनाने में लगा हूं, मेरा घर मुझसे रूठा जा रहा है।"
इस शेर को उन्होंने दो बार दोहराया और यह साफ किया कि उनका इशारा सत्ता पक्ष यानी बीजेपी की ओर है। अखिलेश ने कहा कि जब देश की सुरक्षा की बात आती है तो पूरा विपक्ष एकजुट होता है, लेकिन सरकार के पास जनता को जवाब देने की इच्छाशक्ति नहीं है। उन्होंने टिप्पणी की कि “आज विपक्ष को बधाई दी जा रही है, मगर सत्ताधारी पक्ष को कोई शुभकामनाएं नहीं दे रहा।”
"सेना पर गर्व, मगर सियासत पर सवाल"
अखिलेश यादव ने इस दौरान भारतीय सेना की सराहना करते हुए कहा, “हमें अपनी सेना पर गर्व है, यह दुनिया की सबसे बहादुर सेनाओं में से एक है।” उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जब ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था, तब कुछ न्यूज चैनलों ने उत्साह में हदें पार कर दीं—कोई कराची को भारत का हिस्सा बता रहा था, तो कोई यह दावा कर रहा था कि दुश्मन को पकड़ भी लिया गया है।
उन्होंने चुटकी ली कि पहले तो यह कहा गया कि “छह महीने दे दो, पीओके हमारा हो जाएगा,” लेकिन अब जब मौका आया, तो अचानक सीजफायर का ऐलान कर दिया गया।
"सीजफायर किसके कहने पर हुआ?"
अखिलेश ने सवाल उठाया कि सरकार ने आखिर किसके दबाव में आकर सीजफायर का फैसला किया? उन्होंने व्यंग्य के साथ कहा, “इनकी मित्रता गहरी है, शायद अपने दोस्त से ही कह दिया हो कि तुम ही सीजफायर का एलान कर दो, हमें तो अब कुछ करना ही नहीं।”
उन्होंने सरकार से पूछा कि जब हम आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई की बात कर रहे हैं, तो अचानक कदम क्यों पीछे खींच लिए गए? उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
"पुलवामा से पहलगाम तक—इंटेलिजेंस कहां है?"
पूर्व मुख्यमंत्री ने पुलवामा हमले का ज़िक्र करते हुए देश की खुफिया व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “आतंकी हमलों के पीछे बार-बार इंटेलिजेंस फेल्योर का नाम आता है, लेकिन कोई जवाबदेही तय नहीं होती।” उन्होंने पूछा कि अगर खुफिया एजेंसियां अलर्ट नहीं दे पा रहीं, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
"अमृतकाल के नारों से ज़मीनी हालात नहीं बदलते"
अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार 'अमृतकाल' के नारे तो खूब लगाती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। उन्होंने कहा, “अब तो अंतरराष्ट्रीय ताकतें यह दावा कर रही हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोका। अगर ऐसा है तो यह देश की संप्रभुता पर चोट है।” उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के प्रचार पर भी सवाल उठाए और कहा कि देश की रक्षा नीतियों को प्रचार का मंच नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने सरकार से यह भी जानना चाहा कि पाकिस्तान के पीछे आखिर कौन-सी वैश्विक शक्तियां खड़ी हैं, और भारत की रणनीति क्या है?
"चीन से भी खतरा, क्या सरकार तैयार है?"
अखिलेश यादव ने चीन के खतरे को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत को जितना खतरा आतंकवाद से है, उतना ही पड़ोसी देशों की आक्रामक नीतियों से भी है। “हमें अब बहस पाकिस्तान तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। चीन की गतिविधियों पर भी स्पष्ट नीति बनानी होगी।”
"नीतियों में असर और स्थायित्व चाहिए"
अखिलेश ने अंत में कहा कि सिर्फ सैन्य अभियानों से नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में स्थायित्व और असर लाने की ज़रूरत है। उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर सरकार को विफल बताते हुए कहा, “देश की आत्मनिर्भरता और सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हैं, लेकिन सरकार दोनों ही मोर्चों पर गम्भीर नजर नहीं आती।”














