तमिलनाडु की राजनीति में इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि नए समीकरणों के उभरने की कहानी भी बन गया है। फिल्मी दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले थलापति विजय ने अपने पहले ही चुनाव में परंपरागत द्रविड़ दलों के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए खुद को एक मजबूत खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर दिया है। उनकी पार्टी TVK ने 108 सीटों पर जीत दर्ज कर राज्य की सियासत में अपनी ठोस मौजूदगी दर्ज कराई है, लेकिन 118 के बहुमत के आंकड़े से 10 सीटें पीछे रह जाना उनके लिए सत्ता की राह को अब भी पेचीदा बना रहा है।
यह जनादेश साफ तौर पर यह इशारा करता है कि जनता बदलाव चाहती है, लेकिन पूरी सत्ता किसी एक दल को सौंपने के लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं दिख रही। ऐसे में ‘किंग’ बनकर उभरे विजय के सामने अब ‘किंगमेकर’ बनने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है, क्योंकि सरकार बनाने का समीकरण अब उनके फैसलों पर निर्भर करेगा।
द्रविड़ राजनीति के बीच तीसरी ताकत का उभार
तमिलनाडु की राजनीति में पहले भी सिनेमा से जुड़े चेहरों ने अपनी पहचान बनाई है। एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता जैसे दिग्गजों ने सत्ता तक का सफर तय किया, लेकिन रजनीकांत और कमल हासन जैसी बड़ी हस्तियां अपनी लोकप्रियता को वोट में पूरी तरह बदल नहीं पाईं। विजय ने इस ट्रेंड को तोड़ते हुए खुद को एक प्रभावी विकल्प के रूप में पेश किया है।
उनकी सभाओं में उमड़ी भारी भीड़, खासकर युवाओं और शहरी वर्ग की भागीदारी, इस बात का संकेत देती है कि TVK ने ‘एंटी-इन्कम्बेंसी’ और ‘नए विकल्प’ की भावना को बखूबी भुनाया। इतना ही नहीं, दलित और ईसाई वोट बैंक में भी सेंध लगाकर उन्होंने पारंपरिक समीकरणों को हिला दिया, जो पहले द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ जुड़ा माना जाता था।
विजय के सामने सरकार बनाने के चार रास्ते
अब असली चुनौती चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने की है। विजय के पास चार संभावित विकल्प मौजूद हैं, लेकिन हर विकल्प अपने साथ जोखिम और समझौते लेकर आता है।
1. कांग्रेस के साथ गठबंधन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पहले ही समर्थन के संकेत दे चुकी है। यह रास्ता अपेक्षाकृत आसान दिखता है, जहां वैचारिक टकराव कम है और बहुमत तक पहुंचना भी संभव हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विजय अपनी ‘नई राजनीति’ की छवि को बरकरार रखते हुए कांग्रेस के साथ खड़े रह पाएंगे?
2. NDA या BJP के साथ हाथ मिलाना
भारतीय जनता पार्टी को विजय पहले ही वैचारिक रूप से विरोधी बता चुके हैं। ऐसे में NDA के साथ जाना उनके कोर वोटर्स, खासकर अल्पसंख्यक और उदारवादी वर्ग को असहज कर सकता है। हालांकि राजनीति में समीकरण अक्सर बदलते हैं और सत्ता की जरूरत कई बार पुराने रुख को बदल देती है।
3. AIADMK के साथ पोस्ट-पोल गठबंधन
अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ गठबंधन सबसे व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है। चुनाव से पहले भले ही बातचीत अधूरी रह गई हो, लेकिन अब सत्ता की मजबूरी दोनों को करीब ला सकती है। AIADMK भी अपनी खोई जमीन तलाश रही है, और विजय के साथ गठजोड़ उसे नई ऊर्जा दे सकता है।
4. छोटे दलों और निर्दलीयों के साथ तीसरा मोर्चा
विजय छोटे क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर ‘थर्ड फ्रंट’ तैयार कर सकते हैं। इससे उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता जरूर मिलेगी, लेकिन ऐसी सरकारों की स्थिरता अक्सर सवालों के घेरे में रहती है, क्योंकि समर्थन कभी भी डगमगा सकता है।
क्या विजय अपने ही नैरेटिव से समझौता करेंगे?
चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने खुद को द्रविड़ राजनीति के विकल्प के रूप में पेश किया और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और BJP दोनों पर खुलकर निशाना साधा। ऐसे में अब किसी भी बड़े दल के साथ जाना उनके उस नैरेटिव को कमजोर कर सकता है, जिसने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है। दूसरी ओर, अगर वह अपने सिद्धांतों पर अड़े रहते हैं और गठबंधन से बचते हैं, तो सत्ता उनसे दूर भी जा सकती है।
असली परीक्षा अब शुरू
तमिलनाडु का यह जनादेश अधूरा नहीं, बल्कि संतुलित कहा जा सकता है। जनता ने बदलाव की इच्छा तो जाहिर की है, लेकिन किसी एक दल को पूरी ताकत नहीं दी। एम. के. स्टालिन की DMK और AIADMK के बीच दशकों से चल रही राजनीति के बीच अब विजय तीसरे मजबूत विकल्प के रूप में उभरे हैं।
लेकिन राजनीति में उभरना जितना कठिन होता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है उस स्थान को बनाए रखना। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि विजय ‘सिस्टम बदलने’ की राह चुनते हैं या ‘सिस्टम का हिस्सा’ बनकर सत्ता तक पहुंचने का फैसला करते हैं।














