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तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर: सीएम एमके स्टालिन को कोलाथुर सीट पर मिली हार, पुराने सहयोगी ने दी करारी शिकस्त

तमिलनाडु चुनाव 2026 में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला, जहां सीएम एमके स्टालिन को कोलाथुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। उनके पुराने सहयोगी और TVK उम्मीदवार वी. एस. बाबू ने उन्हें करारी शिकस्त दी, जिससे राज्य की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Mon, 04 May 2026 6:00:38

तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर: सीएम एमके स्टालिन को कोलाथुर सीट पर मिली हार, पुराने सहयोगी ने दी करारी शिकस्त

तमिलनाडु की राजनीति में इस बार के चुनाव नतीजों ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया है। राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम. के. स्टालिन एमके स्टालिन को कोलाथुर विधानसभा सीट पर करारी हार का सामना करना पड़ा है। यह वही सीट मानी जाती थी जिसे उनका सबसे मजबूत गढ़ और लगभग अजेय माना जाता था। स्टालिन इस सीट से लगातार तीन बार 2011, 2016 और 2021 में जीत दर्ज कर चुके थे, लेकिन इस बार समीकरण पूरी तरह बदल गए। उन्हें हराने वाले उम्मीदवार कोई और नहीं बल्कि उनके ही पुराने सहयोगी और TVK TVK के प्रत्याशी वी. एस. बाबू साबित हुए हैं, जिन्होंने राजनीतिक हलकों में बड़ा उलटफेर कर दिया है। पिछली बार 2021 में स्टालिन ने इसी सीट पर AIADMK AIADMK के उम्मीदवार आदि राजाराम को हराया था।

वी. एस. बाबू का TVK से जुड़ना बना गेमचेंजर

वी. एस. बाबू कभी डीएमके के ही सक्रिय सदस्य और विधायक रह चुके हैं। 2011 के विधानसभा चुनाव में वे कोलाथुर सीट से एमके स्टालिन के चुनाव अभियान के इंचार्ज भी रहे थे। हालांकि बाद में राजनीतिक मतभेदों के चलते उन्होंने डीएमके छोड़ दी और AIADMK का दामन थाम लिया। इसके बाद फरवरी 2026 में उन्होंने एक बार फिर बड़ा कदम उठाते हुए थलापति विजय के नेतृत्व वाली TVK पार्टी जॉइन कर ली। माना जा रहा है कि इसी राजनीतिक सफर और जमीनी पकड़ ने उन्हें कोलाथुर जैसे मजबूत गढ़ में जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

स्टालिन का लंबे समय से मजबूत किला टूटा

तमिलनाडु की राजनीति में एम. के. स्टालिन को अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। वे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि एम करुणानिधि के पुत्र हैं, जिन्होंने पांच बार राज्य का नेतृत्व किया था। 2018 में करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन ने डीएमके की कमान संभाली और पार्टी को नई दिशा देने की कोशिश की। कोलाथुर सीट को 2011 में पुनर्गठन के बाद विल्लिवक्कम और पुरासावक्कम क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया था। इसके गठन के बाद से यह सीट लगातार स्टालिन के कब्जे में रही थी, लेकिन इस बार मतदाताओं ने एक अलग निर्णय लेते हुए राजनीतिक इतिहास बदल दिया।

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