
खाटूश्यामजी में बसंत पंचमी का पावन पर्व पूरी आस्था, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस शुभ अवसर पर बाबा श्याम का दरबार पीले रंग की आभा से जगमगा उठा है। पीतांबरी वस्त्रों और सुगंधित पीले पुष्पों से किए गए भव्य श्रृंगार ने मंदिर की छटा को और दिव्य बना दिया है। बाबा श्याम के इस विशेष स्वरूप के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु खाटूधाम पहुंच रहे हैं।
श्री श्याम मंदिर कमेटी के अनुसार, आज यानी 22 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर परंपरा के अनुसार बाबा श्याम को पंचामृत से विधिवत स्नान कराया गया और उनका अधोवस्त्र बदला गया। यह एक प्राचीन परंपरा है, जो वर्ष में केवल एक बार बसंत पंचमी के दिन ही निभाई जाती है। मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस दिन बाबा श्याम के पीले वस्त्र या अधोवस्त्र को श्रद्धालुओं में बांटने की कोई परंपरा नहीं है, इसे लेकर फैलाई जा रही बातों से भक्तों को भ्रमित नहीं होना चाहिए।
देशभर से खाटूधाम की ओर उमड़ी श्रद्धा
पीला रंग बसंत ऋतु का प्रतीक होने के साथ-साथ ज्ञान की देवी मां सरस्वती, सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का भी संकेत माना जाता है। इसी भाव के चलते बसंत पंचमी पर बाबा श्याम को पीले फूलों और वस्त्रों से सजाया जाता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने दर्शन के लिए विशेष इंतजाम किए हैं, ताकि भक्त शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से बाबा श्याम के दर्शन कर सकें और पर्व की पवित्रता बनी रहे।
इस पावन पर्व पर देशभर से आए श्रद्धालुओं से खाटूधाम गुलजार हो उठा है। मंदिर परिसर ही नहीं, बल्कि पूरा खाटू नगर भक्तिरस में डूबा नजर आ रहा है। हर ओर “श्याम बाबा की जय” के जयकारे गूंज रहे हैं। स्थानीय लोगों और व्यापारियों में भी उत्साह और उमंग का माहौल देखने को मिल रहा है।
मंदिर कमेटी ने स्पष्ट किया भ्रम
श्री श्याम मंदिर कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मोहनदास सिंह महाराज ने बताया कि बाबा श्याम का अधोवस्त्र लगभग 13 मीटर लंबा होता है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। हालांकि, लाखों भक्तों में इसका वितरण व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। पूर्व में अधोवस्त्र वितरण को लेकर अव्यवस्था और लूट-खसोट जैसी शिकायतें सामने आई थीं। इसी वजह से बाजार में कुछ व्यापारियों द्वारा ‘पीतांबरी’ के नाम पर भ्रम फैलाने की कोशिशें की गईं। मंदिर कमेटी ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और परंपराओं का सम्मान करते हुए दर्शन का लाभ उठाएं।














