
अरावली की कठिन पहाड़ियों में स्थित राह का माला गांव, स्थानीय भाषा में रैकामाला के नाम से जाना जाता है, आज भी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है। कोटपूतली-बहरोड़ जिले के बानसूर क्षेत्र में बसा यह गांव बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और साफ पानी जैसी आवश्यक सुविधाओं से दूर है। यहां दिन में केवल दो घंटे सोलर लाइट उपलब्ध होती है, जबकि शेष 20-22 घंटे ग्रामीण अंधकार, धूप और जंगली जानवरों के खतरे में बिताते हैं। वही तालाब, जिससे मवेशी पानी पीते हैं, ग्रामीणों के लिए पीने के गंदे पानी का स्रोत बन चुका है। एनडीटीवी राजस्थान की टीम ने जब गांव का दौरा किया, तो पता चला कि यहां तक पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं। पहाड़ी के संकरे और कच्चे रास्तों पर बड़े-बड़े पत्थर बिखरे हैं, जिससे पैदल चलना भी कठिन है। कई बार पहाड़ी मार्ग से गुजरते वाहन रास्ते में ही फंस जाते हैं। पहली नजर में यह यकीन करना मुश्किल है कि इतनी ऊंचाई पर लोग रह सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि यह लोग पीढ़ियों से कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं।
सरिस्का टाइगर रिजर्व के पास गांव, वन्यजीवों का भय
गांव सरिस्का टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है, जिससे ग्रामीण रात में जंगली जानवरों, खासकर तेंदुए की गुर्राहट से डरते हैं। अंधेरे में घर से बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं है। गांव में न स्कूल है और न कोई स्वास्थ्य केंद्र, जिससे बच्चों की पढ़ाई अधूरी रह जाती है। अधिकतर बच्चे मवेशी चराने, जंगल में घूमने या खेल-कूद में दिन बिताते हैं। जंगली जानवरों के खतरे के कारण माता-पिता बच्चों को दूर बसे स्कूलों तक भेजने का जोखिम नहीं उठा पाते।
हर काम के लिए तय करना पड़ता है लंबा रास्ता
गांव के लोग किसी भी छोटे काम के लिए भी कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। मवेशी चराने के लिए दूर-दूर तक जंगल पार करना पड़ता है। दूसरे गांव तक जाने के लिए भी पहाड़ी और घने जंगलों से होकर गुजरना पड़ता है। बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए ले जाना हो, तो उसे चारपाई पर लिटाकर पहाड़ से नीचे ले जाना पड़ता है, जो बेहद मुश्किल और जोखिम भरा होता है।
ग्रामीणों के पास राशन कार्ड भी नहीं
स्थानीय निवासी पायलट गुर्जर ने बताया कि कई परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, जिससे सरकारी गेहूं और अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। ग्रामीणों की आजीविका पूरी तरह मवेशियों पर निर्भर है। राशन और जरूरी सामान लेने के लिए उन्हें पहाड़ से नीचे पैदल उतरना पड़ता है और सिर पर बोझ उठाकर वापस चढ़ना पड़ता है।














