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उद्धव के सामना में बीजेपी-कांग्रेस पर आरोप, चुनाव आयोग पर उठाए सवाल, लिखा—अब चुनावों का कोई औचित्य नहीं बचा

उद्धव ठाकरे गुट के मुखपत्र सामना के संपादकीय में बीएमसी सहित महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों पर सवाल उठाए गए हैं। बीजेपी-कांग्रेस पर आरोप, चुनाव आयोग की भूमिका पर संदेह और मराठी मानूस की अस्मिता को लेकर तीखा हमला किया गया है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 17 Jan 2026 12:41:55

उद्धव के सामना में बीजेपी-कांग्रेस पर आरोप, चुनाव आयोग पर उठाए सवाल, लिखा—अब चुनावों का कोई औचित्य नहीं बचा

शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के मुखपत्र सामना में प्रकाशित संपादकीय ने मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) समेत महाराष्ट्र की 29 नगरपालिकाओं के चुनाव नतीजों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संपादकीय में भारतीय जनता पार्टी पर सत्ता के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार और चुनावी धांधली के सहारे जीत हासिल करने का आरोप लगाया गया है। सामना ने इन नतीजों को महाराष्ट्र और मराठी मानूस के भविष्य के लिए खतरे की घंटी करार दिया है।

संपादकीय में लिखा गया कि मुंबई सहित 26 नगरपालिकाओं में बीजेपी की कथित ‘लहर’ चली, और उसी लहर पर बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता वाले लोग सत्ता के किनारे लग गए। सामना के शब्दों में, जब ‘न विचार, न भूमिका’ ही राजनीति का आधार बन जाए, तो फिर किसी भी चुनाव का कोई औचित्य नहीं बचता।

अव्यवस्था और अफरा-तफरी के बीच आए नतीजे

सामना के अनुसार, मुंबई समेत 29 नगरपालिकाओं के नतीजे भारी अव्यवस्था और अराजक माहौल में घोषित किए गए। मतगणना के दौरान देर रात तक गड़बड़ियों की खबरें आती रहीं। संपादकीय में कहा गया कि पूरे देश की निगाहें महाराष्ट्र की राजधानी पर टिकी थीं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता कहीं नजर नहीं आई।

संपादकीय में बीजेपी पर स्याही घोटाला, ईवीएम से छेड़छाड़, खुलेआम धन वितरण, फर्जी और दोहरे मतदान जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सामना का दावा है कि इन तमाम हथकंडों के जरिए बीजेपी ने मुंबई पर कब्जा जमाने की दिशा में कदम बढ़ाया। यहां तक कि पूरे नतीजे घोषित होने से पहले ही बीजेपी द्वारा मनाया गया जश्न भी ‘चुनावी घोटाले’ की श्रेणी में बताया गया है।

चुनाव आयोग की निष्क्रियता पर सवाल

सामना ने चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी तीखे सवाल उठाए हैं। संपादकीय में कहा गया कि सैकड़ों मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह गए, लेकिन आयोग मूकदर्शक बना रहा। मतदान के 24 घंटे बाद तक भी सटीक मतदान प्रतिशत सामने नहीं आया, जबकि इसी दौरान टीवी चैनलों पर बीजेपी के पक्ष में एग्जिट पोल चलाए जाते रहे।

‘बीजेपी ऐप’ और आचार संहिता उल्लंघन के आरोप

संपादकीय में दावा किया गया है कि चुनाव अधिकारी खुलेआम मतदाताओं के नाम खोजने के लिए ‘बीजेपी ऐप’ का इस्तेमाल करते पाए गए। आरोप है कि मतदान केंद्रों पर बैठकर अधिकारियों ने बीजेपी की मदद की, जो चुनावी आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है।

सामना ने चेतावनी भरे लहजे में लिखा कि यदि इस तरह की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो फिर चुनाव कराने का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में तो विधायकों, सांसदों और नगरसेवकों को सीधे नियुक्त कर देना ही बेहतर होगा।

‘मराठी मानूस को दरकिनार करने की साजिश’

संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि बीजेपी का असली मकसद मराठी मानूस को हाशिये पर धकेलते हुए मुंबई में अपना महापौर बैठाना था। इस योजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश ‘मिंधे’ यानी उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के जरिए की गई। सामना के मुताबिक, यह अध्याय महाराष्ट्र के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।

संपादकीय में यह भी कहा गया कि बीजेपी ने 100 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया, जबकि शिवसेना और मनसे ने कड़ा संघर्ष किया। ठाणे में शिंदे गुट, वहीं छत्रपति संभाजीनगर, नासिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़, जलगांव और धुले की नगरपालिकाओं पर बीजेपी के नियंत्रण का दावा किया गया है।

कांग्रेस भी निशाने पर

सामना ने कांग्रेस को भी नहीं बख्शा। संपादकीय में लिखा गया कि लातूर में कांग्रेस और वंचित सत्ता में आए, जबकि मराठवाड़ा के परभणी में शिवसेना की जीत संतोषजनक रही। कांग्रेस और वंचित ने कुछ जगहों पर अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन मुंबई में वे 25 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके। लातूर को छोड़कर कांग्रेस-वंचित गठबंधन को खास सफलता नहीं मिली।

डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए सामना ने कहा कि महाराष्ट्र अखंड रहना चाहिए और मुंबई मराठी मानूस के हाथों में ही होनी चाहिए। प्रकाश आंबेडकर द्वारा अपनाए गए अलग राजनीतिक रास्ते पर भी टिप्पणी की गई है। संपादकीय के अनुसार, अकोला जैसे गढ़ में बीजेपी की बढ़ती पैठ चिंता का विषय है।

‘अमृतकाल’ पर तंज

बीजेपी के ‘अमृतकाल’ के नारे पर कटाक्ष करते हुए सामना ने लिखा कि न तो अदालतों में न्याय मिल रहा है और न ही चुनावों में निष्पक्षता दिख रही है। पैसे के बल पर पूरे चुनावी तंत्र पर कब्जा जमाने की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

संपादकीय के अंत में कहा गया कि अत्यंत प्रतिकूल हालातों में भी शिवसेना और मनसे ने डटकर मुकाबला किया और कठिन संघर्ष लड़ा। यह लड़ाई आगे भी जारी रहेगी। सामना ने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि मुंबई और मराठी अस्मिता की लड़ाई कभी थमेगी नहीं।

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