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पुणे की लैब में बन रही देसी कुकिंग गैस, क्या घटेगी विदेशी LPG पर भारत की निर्भरता? जानें पूरी रिपोर्ट

पुणे की CSIR–NCL लैब में वैज्ञानिक डाइमेथाइल ईथर (DME) आधारित देसी कुकिंग गैस पर काम कर रहे हैं, जो भविष्य में LPG का विकल्प बन सकती है। इस तकनीक से भारत की विदेशी LPG पर निर्भरता घटने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ने की उम्मीद है। शुरुआती चरण में 20% DME को LPG के साथ मिलाकर उपयोग करने की योजना है, जिससे बिना किसी बदलाव के घरेलू गैस इस्तेमाल संभव रहेगा। यह तकनीक न केवल रसोई बल्कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी बड़ा बदलाव ला सकती है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Mon, 18 May 2026 3:30:41

पुणे की लैब में बन रही देसी कुकिंग गैस, क्या घटेगी विदेशी LPG पर भारत की निर्भरता? जानें पूरी रिपोर्ट

देश में रसोई गैस यानी एलपीजी का इस्तेमाल हर दिन करोड़ों घरों में खाना बनाने के लिए किया जाता है। हालांकि, इसकी आपूर्ति और उपलब्धता को बनाए रखने के लिए भारत अभी भी बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है। इसी निर्भरता को कम करने के लिए पुणे स्थित सीएसआईआर–नेशनल केमिकल लैबोरेटरी में वैज्ञानिक एक वैकल्पिक ईंधन पर काम कर रहे हैं, जो भविष्य में एलपीजी का मजबूत विकल्प बन सकता है। इस तकनीक का नाम डाइमेथाइल ईथर (DME) है, जिसे कोयला, बायोमास और मेथनॉल जैसे घरेलू संसाधनों से तैयार किया जा सकता है।

अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो भारत को विदेशी एलपीजी पर निर्भरता से काफी राहत मिल सकती है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

शुरुआती चरण में LPG के साथ DME का मिश्रण

इस परियोजना से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. टी. राजा के अनुसार, DME का उपयोग एलपीजी के साथ आसानी से किया जा सकता है क्योंकि दोनों के गुण काफी हद तक समान हैं। इसे प्रोपेन और ब्यूटेन गैस के साथ मिलाकर घरेलू उपयोग या औद्योगिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

योजना के तहत शुरुआती चरण में 20 प्रतिशत DME और 80 प्रतिशत LPG का मिश्रण तैयार किया जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि उपभोक्ताओं को अपने मौजूदा गैस सिलेंडर या चूल्हे में किसी तरह का बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वे इसे सामान्य एलपीजी की तरह ही उपयोग कर सकेंगे।

सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहेगा उपयोग


वैज्ञानिकों का कहना है कि DME का उपयोग केवल घरेलू रसोई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह परिवहन क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एलपीजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा और अन्य वाहनों के लिए यह एक वैकल्पिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तरह यह तकनीक ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी बड़ा बदलाव ला सकती है और ईंधन के नए विकल्पों को बढ़ावा दे सकती है।

आयात में भारी कमी की संभावना

रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि भारत एलपीजी में 20 प्रतिशत DME ब्लेंडिंग को अपनाता है, तो हर साल लगभग 63 लाख टन एलपीजी के आयात में कमी आ सकती है।

इससे देश को करीब 4.04 अरब डॉलर यानी लगभग 34,200 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होने का अनुमान है। मौजूदा वैश्विक हालात, खासकर पश्चिम एशिया में तनाव और सप्लाई चेन की अनिश्चितता को देखते हुए यह कदम भारत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

DME बनाने की प्रक्रिया

DME तैयार करने की प्रक्रिया तकनीकी रूप से काफी दिलचस्प है। इसमें कोल गैसीफिकेशन तकनीक के जरिए कोयले को पहले सिंथेटिक गैस में बदला जाता है और फिर उसे आगे प्रोसेस करके DME में परिवर्तित किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब DME जलता है तो यह पारंपरिक हाइड्रोकार्बन ईंधनों की तुलना में कम प्रदूषण पैदा करता है, इसलिए इसे एक स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल ईंधन विकल्प माना जा रहा है।

भारत में पहले ही ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा 20 प्रतिशत DME–LPG ब्लेंडिंग के मानकों को मंजूरी दी जा चुकी है। हालांकि फिलहाल इसका उत्पादन सीमित स्तर पर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निवेश और नीति समर्थन मिले तो यह क्षेत्र तेजी से विस्तार कर सकता है।

वैश्विक स्तर पर चीन की बढ़त

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर DME उत्पादन में चीन सबसे आगे है और वैश्विक उत्पादन क्षमता का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा उसी के पास है। ऐसे में भारत इस तकनीक पर तेजी से काम कर अपनी ऊर्जा निर्भरता को कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम पहल


पुणे की इस प्रयोगशाला में काम कर रहे युवा वैज्ञानिकों का कहना है कि यह परियोजना केवल एक शोध नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मिशन है। उनका मानना है कि आने वाले समय में DME भारत के ऊर्जा क्षेत्र में वही भूमिका निभा सकता है, जो वर्षों से LPG निभाता आया है।

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