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सुबह 6 बजे से ही मिलने का वक्त तय कर देते थे ‘दादा’, तंबाकू, गुटखा और शराब से थी सख्त दूरी

सुबह 6 बजे से काम शुरू करने वाले ‘दादा’ अजित पवार का अनुशासित जीवन, ग्रामीण राजनीति पर मजबूत पकड़ और तंबाकू-गुटखा व शराब से सख्त दूरी—जानिए उनकी कार्यशैली और सोच की पूरी कहानी।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 28 Jan 2026 2:45:36

सुबह 6 बजे से ही मिलने का वक्त तय कर देते थे ‘दादा’, तंबाकू, गुटखा और शराब से थी सख्त दूरी

भारतीय राजनीति में ऐसे नेता बहुत कम देखने को मिलते हैं, जिनका दिन सूरज उगने से पहले ही शुरू हो जाए और जो अपने साथ-साथ पूरे सिस्टम को भी उसी अनुशासन में ढाल दें। महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ के नाम से पहचाने जाने वाले अजित पवार इसी श्रेणी के नेता थे। वह न केवल स्वयं सुबह छह बजे काम के लिए तैयार रहते थे, बल्कि कार्यकर्ताओं और अधिकारियों को भी उसी समय मिलने का समय देना उनकी पहचान बन चुकी थी।

बारामती नगर परिषद चुनाव में एक बार फिर नगराध्यक्ष बने सचिन सातव बताते हैं कि जब-जब अजित पवार बारामती में होते थे, सुबह होते ही शहर के अलग-अलग इलाकों में चल रहे विकास कार्यों का निरीक्षण करने निकल पड़ते थे। उनकी मौजूदगी का असर यह होता था कि ठेकेदार, इंजीनियर और कर्मचारी समय से पहले ही साइट पर पहुंच जाते थे। काम में ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी।

मुंबई स्थित सरकारी आवास पर भी यही सख्ती और अनुशासन देखने को मिलता था। अजित पवार स्वयं तड़के तैयार हो जाते थे और उनके विभागों के अधिकारी भी सुबह-सुबह अलर्ट मोड में रहते थे। सभी जानते थे कि किसी भी वक्त उपमुख्यमंत्री का फोन आ सकता है और तुरंत बंगले पर हाजिर होना पड़ सकता है।

ग्रामीण राजनीति और वित्तीय समझ पर गहरी पकड़

छह अलग-अलग कार्यकाल में उपमुख्यमंत्री रह चुके अजित पवार को सिर्फ सत्ता का अनुभवी चेहरा नहीं माना जाता था, बल्कि वह अर्थव्यवस्था और ग्रामीण विकास की गहरी समझ रखने वाले नेता भी थे। वित्त मंत्री के रूप में कई बार काम करने के कारण उन्हें यह भली-भांति पता था कि किस योजना में कितनी राशि जरूरी है और कहां फिजूलखर्ची से बचा जाना चाहिए।

उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत वर्ष 1982 में एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड सदस्य के रूप में हुई थी। इसके बाद सहकारिता आंदोलन और सहकारी बैंकों में उनकी भूमिका लगातार मजबूत होती चली गई। इसी वजह से उन्हें महाराष्ट्र के सहकारिता तंत्र का जानकार माना जाता था। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह भी कई मौकों पर इस बात का उल्लेख कर चुके हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह भी माना जाता रहा कि 2023 में शिंदे सरकार में अजित पवार को शामिल करने के पीछे एक रणनीतिक सोच थी—जिसके तहत भाजपा सहकारिता क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती थी और इसमें अजित पवार की भूमिका अहम मानी गई।

तंबाकू, गुटखा और शराब से थी सख्त दूरी

अजित पवार स्वयं किसी भी प्रकार के नशे से पूरी तरह दूर रहते थे और यही अपेक्षा वह दूसरों से भी रखते थे। नशे के प्रति उनकी सख्त सोच समय के साथ और मजबूत होती गई, खासकर तब जब उनके चाचा शरद पवार को मुख कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा।

तंबाकू, गुटखा या पान का सेवन करने वालों को वह सार्वजनिक मंचों पर भी फटकार लगाने से नहीं हिचकिचाते थे। उन्हें लगता था कि जनप्रतिनिधियों को समाज के लिए उदाहरण बनना चाहिए, न कि गलत आदतों को बढ़ावा देना चाहिए।

महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय आर. आर. पाटिल की कैंसर से हुई मृत्यु ने भी उनकी सोच को और पुख्ता किया। बीमारी सामने आने से पहले ही अजित पवार, उम्र में छोटे होने के बावजूद, कई बार आर. आर. पाटिल को तंबाकू की आदत को लेकर सार्वजनिक रूप से टोका करते थे। उनका मानना था कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को अपनी सेहत और आदतों के प्रति सबसे ज्यादा सजग होना चाहिए।

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