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राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने कसी कमर, झारखंड में भूपेश बघेल-अजय शर्मा को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

राज्यसभा चुनाव 2026 से पहले कांग्रेस ने झारखंड में तैयारियां तेज कर दी हैं। भूपेश बघेल और अजय शर्मा को पर्यवेक्षक बनाकर पार्टी ने उम्मीदवार प्रणव झा की जीत सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 06 Jun 2026 9:17:15

राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने कसी कमर, झारखंड में भूपेश बघेल-अजय शर्मा को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

झारखंड में होने वाले आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। चुनावी तैयारियों को गति देते हुए पार्टी नेतृत्व ने महत्वपूर्ण संगठनात्मक कदम उठाया है। कांग्रेस हाईकमान ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वरिष्ठ नेता अजय शर्मा को झारखंड के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं को राज्यसभा चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने और राजनीतिक समन्वय मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है।

18 जून 2026 को प्रस्तावित राज्यसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस लगातार सक्रिय नजर आ रही है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान संगठन और गठबंधन दोनों स्तरों पर बेहतर तालमेल बना रहे। इसी उद्देश्य से अनुभवी नेताओं को मैदान में उतारा गया है, ताकि उम्मीदवार के पक्ष में माहौल मजबूत किया जा सके और विधायकों के बीच प्रभावी संवाद बना रहे।

कई राज्यों में उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है कांग्रेस

राज्यसभा चुनाव की तैयारियों के तहत कांग्रेस अब तक विभिन्न राज्यों की सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर चुकी है। पार्टी ने कुल 10 राज्यों में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए सात उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इसी क्रम में शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कर्नाटक से अपना नामांकन पत्र दाखिल कर चुनावी प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया।

कांग्रेस की घोषित सूची में कर्नाटक से मल्लिकार्जुन खरगे, पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती, राजस्थान से नीरज डांगी और झारखंड से प्रणव झा को टिकट दिया गया है। इन नामों के जरिए पार्टी ने विभिन्न राज्यों में अपने राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है।

इस बार राज्यसभा की 24 द्विवार्षिक रिक्त सीटों के लिए चुनाव होने हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा में खाली हुई तीन सीटों पर उपचुनाव भी कराए जाएंगे। ऐसे में यह चुनाव कई राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है।

झारखंड में कांग्रेस की भूमिका को देखते हुए बढ़ी अहमियत

झारखंड की राजनीति में कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेतृत्व वाले गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी है। राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं, जो उसे गठबंधन में महत्वपूर्ण स्थान दिलाते हैं। इसी राजनीतिक ताकत के आधार पर पार्टी ने राज्यसभा की एक सीट पर अपना दावा पेश किया था।

कांग्रेस का मानना था कि विधानसभा में उसकी संख्या और गठबंधन में उसकी भूमिका को देखते हुए उसे राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने प्रणव झा को उम्मीदवार बनाकर चुनावी मुकाबले में उतारा है। अब पार्टी का पूरा फोकस उनकी जीत सुनिश्चित करने पर केंद्रित दिखाई दे रहा है।

संगठन को मजबूत करने में भी जुटी पार्टी

राज्यसभा चुनाव की तैयारियों के समानांतर कांग्रेस झारखंड में संगठनात्मक ढांचे को भी मजबूत करने का प्रयास कर रही है। हाल ही में पार्टी ने 36 सदस्यीय राजनीतिक मामलों की समिति का गठन किया है, जिसे राज्य में संगठन और राजनीतिक गतिविधियों को बेहतर ढंग से संचालित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इस समिति में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश के साथ-साथ वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को भी शामिल किया गया है। पार्टी का मानना है कि मजबूत संगठन ही चुनावी सफलता की नींव तैयार करता है, इसलिए राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों मोर्चों पर समान रूप से काम किया जा रहा है।

गठबंधन में तालमेल, लेकिन अलग पहचान भी बरकरार

झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम के बीच गठबंधन सहयोगात्मक बना हुआ है और दोनों दल कई मुद्दों पर एक साथ काम करते रहे हैं। हालांकि कांग्रेस राज्य की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की कोशिश भी लगातार करती रही है।

भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, खनन नीति और स्थानीय जनहित से जुड़े कई विषयों पर कांग्रेस समय-समय पर अपनी अलग राय सामने रखती रही है। पार्टी का प्रयास है कि गठबंधन का हिस्सा रहते हुए भी उसकी राजनीतिक पहचान और जनाधार मजबूत बना रहे। ऐसे में राज्यसभा चुनाव केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति को और मजबूत करने का अवसर भी माना जा रहा है।

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