
जम्मू-कश्मीर की धरती एक बार फिर अपने भीतर छिपे इतिहास की गवाही दे रही है। अनंतनाग जिले के ऐशमुकाम क्षेत्र के सलिया गांव में हाल ही में की गई खुदाई के दौरान वहां से शिवलिंग और कई प्राचीन मूर्तियां बरामद हुई हैं, जिन्हें देखकर स्थानीय लोगों में गहरी आस्था और उत्सुकता का संचार हुआ है। खुदाई के दौरान इन प्रतिमाओं का बाहर आना सिर्फ एक पुरातात्विक घटना नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर की पुनर्प्रतिष्ठा जैसा प्रतीत हो रहा है।
जलस्रोत की सफाई के दौरान सामने आया पुरातन वैभव
सलिया गांव में एक प्राचीन झरने (स्थानीय रूप में 'नाग') की सफाई और जीर्णोद्धार का काम चल रहा था। यह झरना ‘करकूट नाग’ के नाम से जाना जाता है, जिसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व स्थानीय पंडित समुदाय में वर्षों से रहा है। सफाई के दौरान जब नीचे की परतें हटाई गईं, तो मिट्टी और पत्थरों के बीच से शिवलिंग, देवी-देवताओं की मूर्तियां और अन्य धार्मिक प्रतिमाएं बाहर आने लगीं। इन सभी मूर्तियों को पत्थर से तराशा गया है, जिनमें से कुछ पर शैव धर्म से संबंधित आकृतियाँ स्पष्ट रूप से उकेरी गई हैं।
स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया: ‘यहां कभी मंदिर था’
खुदाई में सामने आए इन अवशेषों को देखकर क्षेत्र के कई वरिष्ठ नागरिकों, विशेष रूप से कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों ने दावा किया कि वर्षों पूर्व इस स्थान पर एक प्राचीन मंदिर मौजूद था, जो समय के साथ जमींदोज हो गया। उनका मानना है कि करकूट नाग क्षेत्र कभी तीर्थस्थल हुआ करता था और यहां आसपास कई मंदिर थे, जिन्हें समय, राजनीतिक अस्थिरता और स्थानांतरण की प्रक्रिया ने मिटा दिया।
स्थानीय निवासी श्याम लाल भट ने बताया, “हमारे पूर्वजों से हमने सुना है कि यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता था। यहां शिवजी का एक बड़ा मंदिर था, जहां नागपंचमी और श्रावण मास में विशेष पूजा होती थी।”
पुरातत्व विभाग सक्रिय, मूर्तियां भेजी गईं म्यूजियम
जैसे ही यह जानकारी सार्वजनिक हुई, जम्मू-कश्मीर सरकार के अभिलेख, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग (Department of Archives, Archaeology and Museums, J&K) के अधिकारियों ने स्थल का दौरा किया। उन्होंने इन मूर्तियों की प्रारंभिक जांच की और उन्हें श्रीनगर स्थित श्री प्रकाश सिंह (SPS) म्यूजियम भेज दिया गया है, जहां विशेषज्ञ इन पर अध्ययन कर उनके काल, निर्माण तकनीक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का निर्धारण करेंगे।
पुरातत्व अधिकारियों के अनुसार, यह खोज इस बात का संकेत हो सकती है कि यह स्थान किसी समय कर्कोटा वंश (Karkota Dynasty) के प्रभाव में रहा हो, जिनका शासन कश्मीर में 7वीं से 9वीं शताब्दी तक रहा था और जो शैव धर्म के समर्थक माने जाते हैं।
मंदिर निर्माण की मांग और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि करकूट नाग स्थल को आधिकारिक तीर्थस्थल घोषित किया जाए और वहां एक नया मंदिर बनाया जाए, ताकि इन शिवलिंगों को यथास्थान पुनः स्थापित किया जा सके। उनका कहना है कि यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान के पुनर्स्थापन का केंद्र बन सकता है।
इस खोज को लेकर कई लोग इसे धार्मिक पुनरुद्धार की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं। खासकर कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए यह एक भावनात्मक क्षण है, जो वर्षों से अपने धार्मिक स्थलों और परंपराओं के पुनर्स्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सलिया गांव में मिली ये मूर्तियां सिर्फ पत्थर की कलाकृतियां नहीं हैं, बल्कि एक सभ्यता के निशान हैं, जो सदियों से मिट्टी में दबी पड़ी थीं। इस खोज ने न केवल स्थानीय लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य किया है, बल्कि प्रशासन और पुरातत्व विभाग को भी कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर की ओर गंभीरता से ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है। अगर इन संकेतों को सही दिशा में संभाला जाए, तो यह स्थल आने वाले समय में आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है।














