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दीवार फांदकर शहीदों के कब्रिस्तान पहुंचे उमर अब्दुल्ला, कहा– हमें गुलाम समझने की भूल कर रही सरकार

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार को केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन के खिलाफ खुली चुनौती पेश करते हुए एक अप्रत्याशित कदम उठाया।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Mon, 14 Jul 2025 5:23:38

दीवार फांदकर शहीदों के कब्रिस्तान पहुंचे उमर अब्दुल्ला, कहा– हमें गुलाम समझने की भूल कर रही सरकार

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार को केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन के खिलाफ खुली चुनौती पेश करते हुए एक अप्रत्याशित कदम उठाया। उन्होंने अपने कैबिनेट सदस्यों के साथ श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में स्थित शहीदों के कब्रिस्तान में दीवार फांदकर प्रवेश किया और 13 जुलाई 1931 के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह कदम तब उठाया गया जब प्रशासन ने उन्हें कब्रिस्तान में दाखिल होने से रोकने की कोशिश की थी।

सरकार की रोक को दी चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी खुद उमर अब्दुल्ला ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर दी। उन्होंने लिखा, "अनिर्वाचित सरकार ने मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की और मुझे नौहट्टा चौक से पैदल चलने पर मजबूर किया। उन्होंने नक्शबंद साहब की दरगाह का दरवाजा बंद कर दिया और मुझे दीवार फांदने पर मजबूर किया। उन्होंने मुझे शारीरिक रूप से रोकने की कोशिश की, लेकिन आज मैं रुकने वाला नहीं था।"

उमर अब्दुल्ला ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में श्रद्धांजलि देने तक की स्वतंत्रता छीनी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन उन्हें और उनके सहयोगियों को पहले ही नजरबंद करने की कोशिश कर चुका था, लेकिन वह बिना सूचना दिए कब्रिस्तान तक पहुंचे।

"हम किसी के गुलाम नहीं हैं"

मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, "जो लोग कानून व्यवस्था बनाए रखने की बात करते हैं, वही हमें रोकने में लगे हैं। मैं जानना चाहता हूं कि किस कानून के तहत मुझे शहीदों को श्रद्धांजलि देने से रोका गया? यह कोई राजशाही नहीं है। हम गुलाम नहीं हैं। हम सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लोगों के सेवक हैं।"

उन्होंने यह भी बताया कि प्रशासन ने उनके झंडे को फाड़ने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद वे वहां पहुंचे और फातिहा पढ़ी। अब्दुल्ला ने चेतावनी देते हुए कहा, “13 जुलाई को हमें रोका गया, लेकिन कब तक रोकेंगे? हम जब चाहें, तब आएंगे।”

शहीद दिवस पर पाबंदी का विरोध

यह पूरा विवाद 13 जुलाई 1931 को महाराजा हरि सिंह की रियासत में हुए आंदोलन और पुलिस फायरिंग में मारे गए 22 लोगों की याद में हर साल मनाए जाने वाले 'शहीद दिवस' से जुड़ा है। यह दिन लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर में राजकीय अवकाश के तौर पर मनाया जाता रहा है। लेकिन केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 2020 में इसे छुट्टियों की सूची से हटा दिया गया।

रविवार को ही कई नेशनल कॉन्फ्रेंस नेताओं को नजरबंद किया गया था ताकि वे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजन न कर सकें। इसके जवाब में अब्दुल्ला का यह कदम अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।

1931 के शहीद बनाम जलियांवाला बाग की तुलना

उमर अब्दुल्ला ने एक पोस्ट में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले इन शहीदों की तुलना जलियांवाला बाग कांड के शहीदों से करते हुए लिखा था, "यह कितनी शर्म की बात है कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने वाले सच्चे नायकों को आज खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है।"

उमर अब्दुल्ला का यह साहसिक कदम जम्मू-कश्मीर की सियासत में एक और बड़ा संकेत है कि घाटी में राजनीतिक असहमति और प्रतीकों की लड़ाई अब केवल बयानों तक सीमित नहीं रही। शहीदों के सम्मान में दी गई यह श्रद्धांजलि अब सीधे-सीधे प्रशासन और संवैधानिक अधिकारों की सीमाओं पर बहस का कारण बन गई है।

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