
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने सोमवार को एक अनोखा कदम उठाकर गिग वर्कर्स के जीवन की मुश्किलों को करीब से समझने का प्रयास किया। उन्होंने ब्लिंकइट के डिलीवरी बॉय की भूमिका निभाई और ठंडी रात में स्कूटी पर सवार होकर घर-घर ऑर्डर डिलीवर किए। राघव पीली यूनिफॉर्म में नजर आए, कंधे पर डिलीवरी बैग लटकाया और एक राइडर के साथ मिलकर लोगों तक पार्सल पहुंचाया।
इस अनुभव का वीडियो उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, “Away from boardrooms, at the grassroots. I lived their day. Stay tuned!” यानी बोर्डरूम से दूर, जमीनी स्तर पर, मैंने उनका दिन जिया। यह कदम गिग वर्कर्स की पुरानी समस्याओं को फिर से सामने लाने वाला माना जा रहा है।
गिग वर्कर्स की मुश्किलें और राघव की आवाज
राघव चड्ढा पिछले कई महीनों से Zomato, Swiggy, Blinkit, Zepto जैसे प्लेटफॉर्म्स पर काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स की स्थिति पर आवाज उठाते रहे हैं। दिसंबर 2025 में उन्होंने संसद में कहा था कि “10 मिनट डिलीवरी कल्चर” इन वर्कर्स की जान को खतरे में डालता है। तेज रफ्तार में बाइक चलाना, रेड लाइट जंप करना, ताकि रेटिंग न गिरे या इंसेंटिव कट न हो, उनके लिए रोज़मर्रा की चुनौती बन चुका है।
राघव ने इसे “क्रूरता” बताया और मांग की कि यह मॉडल खत्म किया जाए। उनका कहना है कि इस प्रणाली में गिग वर्कर्स की हालत दिहाड़ी मजदूरों से भी बदतर हो गई है। उदाहरण के तौर पर, सितंबर 2025 में ब्लिंकइट डिलीवरी बॉय हिमांशु थपलियाल का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने बताया कि 15 घंटे काम, 28 डिलीवरी और 50 किलोमीटर से ज्यादा की सवारी के बाद उन्हें केवल 763 रुपये मिले।
Away from boardrooms, at the grassroots. I lived their day.
— Raghav Chadha (@raghav_chadha) January 12, 2026
Stay tuned! pic.twitter.com/exGBNFGD3T
संसद में उठाई गई आवाज
राघव ने हिमांशु को अपने घर लंच पर बुलाया, उनकी समस्याएं सुनी और गिग वर्कर्स के अधिकारों के लिए संसद में लड़ाई तेज की। 31 दिसंबर 2025 को गिग वर्कर्स ने देशव्यापी स्ट्राइक की, जिसमें 10 मिनट की समय सीमा हटाने, उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, बीमा), काम के घंटे तय करने और सम्मान की मांग की गई।
राघव ने इस स्ट्राइक का समर्थन किया और सवाल उठाया कि प्लेटफॉर्म्स अरबों रुपये कमाते हैं, लेकिन वर्कर्स को “मिसक्रीएंट्स” कहकर अपमानित किया जाता है।
डिलीवरी बॉय बनने का अर्थ
राघव चड्ढा का यह कदम केवल एक स्टंट नहीं है। यह गिग इकॉनमी में मौजूद शोषण के खिलाफ जमीनी स्तर पर उठाई गई आवाज है। उनका मानना है कि इससे सरकार और कंपनियां इन लाखों अनदेखे वर्कर्स को सुरक्षा, सम्मान और उचित अधिकार देने के लिए गंभीर होंगी।













