
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति पर केवल नाबालिग लड़की के निजी अंगों को छूने का आरोप है, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 एबी (दुष्कर्म) या पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 (गंभीर यौन अपराध) के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक अपील पर सुनवाई के दौरान दिया।
इस प्रकरण में अपीलकर्ता पर आरोप था कि उसने एक 12 वर्षीय बच्ची के साथ शारीरिक छेड़छाड़ की। निचली अदालत और फिर उच्च न्यायालय ने उसे दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई थी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को संशोधित करते हुए कहा कि जो आरोप सामने आए हैं, वे तकनीकी रूप से दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आते।
न्यायालय ने तीन अलग-अलग मौकों पर पीड़िता द्वारा दिए गए बयानों, मेडिकल रिपोर्ट और उसकी मां के बयान का परीक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि घटना में यौन उत्पीड़न की पुष्टि नहीं होती। इन साक्ष्यों के आधार पर, कोर्ट ने यह कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 या IPC की धारा 376 एबी के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।
हालांकि, अदालत ने इस बात को नज़रअंदाज नहीं किया कि आरोपी ने लड़की के निजी अंगों को छूने की हरकत की थी। इसके चलते कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (स्त्री की लज्जा भंग करना) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 (गंभीर यौन संपर्क) के तहत संशोधित कर दिया। अब उसे पांच और सात वर्षों की सज़ा दी गई है, जो साथ-साथ चलेगी।
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 12 साल की बच्ची के साथ इस तरह की हरकत अपने आप में एक गंभीर अपराध है और समाज में गलत संदेश भेज सकती है। वहीं, बचाव पक्ष ने यह दावा किया कि चूंकि पीड़िता ने खुद यह माना है कि कोई जबरन यौन संपर्क नहीं हुआ, ऐसे में आरोपी को रेप के आरोप से मुक्त किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने कानूनी और सामाजिक हलकों में बहस छेड़ दी है। कई लोग इस फैसले को तकनीकी भाषा में सही मानते हैं, लेकिन नैतिक रूप से चिंताजनक भी बताते हैं। यह फैसला यह जरूर दर्शाता है कि भारतीय कानून में यौन अपराधों की परिभाषा और उनके तत्वों की व्याख्या किस हद तक निर्णायक होती है, विशेषकर जब मामला नाबालिग से जुड़ा हो।














