NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के आरोपों को लेकर देशभर में छात्रों का गुस्सा लगातार बढ़ता गया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) समेत कई छात्र संगठनों ने मोर्चा संभाल रखा था। एक महीने से अधिक समय तक चले इस आंदोलन का शनिवार, 25 जुलाई को बड़ा राजनीतिक असर देखने को मिला, जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शनकारियों की सबसे प्रमुख मांग उनके इस्तीफे की ही थी। प्रधान ने अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंप दिया। वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद यह पहला अवसर माना जा रहा है, जब किसी केंद्रीय मंत्री ने लंबे जनआंदोलन और सार्वजनिक दबाव के बीच अपना पद छोड़ा है।
इस्तीफे की घोषणा के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पत्र साझा किया। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि वे छात्रों के भविष्य को किसी भी प्रकार के विवाद, राजनीतिक खींचतान या कानूनी प्रक्रिया में उलझने नहीं देना चाहते। उन्होंने यह भी लिखा कि कुछ असामाजिक तत्व छात्रों के आंदोलन का गलत फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं, इसलिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्होंने पद छोड़ने का निर्णय लिया है।
मोदी सरकार के कार्यकाल में दुर्लभ घटनाओं में शामिल
साल 2014 से लेकर 2026 तक के मोदी सरकार के कार्यकाल पर नजर डालें तो ऐसे उदाहरण बेहद कम मिलते हैं, जब किसी केंद्रीय मंत्री ने सीधे तौर पर जनदबाव, विरोध प्रदर्शन या छात्र आंदोलन के बाद इस्तीफा दिया हो। यही वजह है कि धर्मेंद्र प्रधान का यह फैसला राजनीतिक दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है।
इससे पहले #MeToo अभियान के दौरान तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर गंभीर आरोपों के घेरे में आए थे। कई महिला पत्रकारों ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। उस समय व्यापक नैतिक दबाव और सार्वजनिक आलोचना के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया था। हालांकि उस प्रकरण में सड़कों पर बड़े पैमाने का कोई जनआंदोलन नहीं चला था, लेकिन आरोपों की गंभीरता के कारण उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा।
अब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उस सूची में एक अलग उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां छात्रों के लंबे आंदोलन और सार्वजनिक मांग के बाद सरकार को अपने मंत्री का पद छोड़वाना पड़ा।
सड़क पर उठी आवाज, संसद तक पहुंचा विवाद
जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्रों का विरोध धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया। आंदोलन की गूंज संसद तक पहुंची, जहां विपक्षी दलों ने सरकार को लगातार घेरने की रणनीति अपनाई।
विपक्ष के नेताओं ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए। उनका आरोप था कि सरकार छात्रों की चिंताओं का समाधान करने के बजाय अपने मंत्री का बचाव करने में अधिक व्यस्त दिखाई दे रही है।
संसद के मानसून सत्र के दौरान कई दिनों तक NEET परीक्षा विवाद और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने जोरदार नारेबाजी की। कई बार कार्यवाही बाधित हुई और सदन में इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली।
शुरुआती दौर में सरकार और शिक्षा मंत्रालय की ओर से यह संकेत दिए गए थे कि मंत्री के इस्तीफे पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है और पूरा ध्यान परीक्षा व्यवस्था में सुधार पर रहेगा। लेकिन जैसे-जैसे जंतर-मंतर पर आंदोलन तेज होता गया, छात्रों की संख्या बढ़ी और संसद के भीतर विपक्ष का दबाव लगातार बढ़ता गया, वैसे-वैसे राजनीतिक परिस्थितियां बदलती चली गईं। आखिरकार सरकार ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करने का फैसला किया।
जब जनआंदोलन के आगे बदले सरकार के फैसले
भारतीय राजनीति में जनआंदोलनों के प्रभाव की चर्चा होती है तो 19 नवंबर 2021 का किसान आंदोलन अक्सर सबसे प्रमुख उदाहरण के रूप में सामने आता है। गुरु पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की थी।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसे अवसर बेहद कम रहे हैं, जब पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार ने लंबे समय तक चले जनविरोध के बाद किसी बड़े विधायी फैसले को वापस लिया हो। यही कारण है कि उस निर्णय को भारतीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना जाता है।
उस समय पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दिल्ली की सीमाओं—सिंघु, टीकरी और गाजीपुर बॉर्डर—पर महीनों तक डटे रहे थे। लगभग एक वर्ष तक चले आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला किया था। अब NEET-UG 2026 विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी उन चुनिंदा घटनाओं में शामिल हो गया है, जहां लंबे जनदबाव और आंदोलन का सीधा असर केंद्र सरकार के फैसले पर देखने को मिला।













