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सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन नियमों में ढील पर जयराम रमेश का हमला, बोले– 'गलत आधारों पर बनी नीति'

सरकार द्वारा सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानकों में दी गई छूट ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण की नीतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जयराम रमेश जैसे विशेषज्ञों की चिंता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी है।

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Sun, 13 Jul 2025 4:42:49

सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन नियमों में ढील पर जयराम रमेश का हमला, बोले– 'गलत आधारों पर बनी नीति'

नई दिल्ली। देश में थर्मल पावर प्लांट्स से जुड़े सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानकों में केंद्र सरकार द्वारा छूट देने के फैसले पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस फैसले को "गलत आधारों पर आधारित नीति" करार देते हुए कहा कि यह निर्णय भारत में वायु प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गंभीर बना देगा। पूर्व पर्यावरण मंत्री रमेश ने यह भी कहा कि जब तक राष्ट्रीय परिवेशीय वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) को अद्यतन नहीं किया जाएगा, तब तक सरकार की नीतियां भ्रामक आंकड़ों पर आधारित बनी रहेंगी।

जयराम रमेश ने फैसले को बताया खतरनाक


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “मोदी सरकार पहले ही भारत को दुनिया का सबसे बड़ा सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जक बना चुकी है। अब पर्यावरण मंत्रालय ने भारत के 78-89 प्रतिशत थर्मल पावर प्लांट्स को फ्लू गैस डी-सल्फराइजेशन (FGD) तकनीक से मुक्त कर दिया है, जिससे ये प्लांट्स सीधे तौर पर सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ते रहेंगे।”

उन्होंने कहा कि सरकार ने जो नीति बनाई है, वह दो "गलत आधारों" पर टिकी हुई है। एक, मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का ध्यान केवल PM10 (10 माइक्रोन से छोटे कण) पर केंद्रित कर दिया है, जबकि PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण कहीं अधिक हानिकारक हैं।

PM2.5 को नजरअंदाज करना पड़ेगा भारी

जयराम रमेश ने चेतावनी दी कि पीएम2.5 जैसे महीन कणों की अनदेखी भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को वर्षों पीछे धकेल सकती है। उन्होंने कहा कि रिसर्च के अनुसार, भारत के कुल PM2.5 प्रदूषण का 12 से 30 प्रतिशत हिस्सा सल्फर डाइऑक्साइड से बना होता है, जो हवा में अन्य तत्वों के साथ मिलकर सूक्ष्म कण बनाता है।

उन्होंने कहा, “सल्फर डाइऑक्साइड न केवल सीधे फेफड़ों पर असर डालता है, बल्कि यह मानसून चक्र में भी बाधा उत्पन्न करता है। इससे कृषि और जल स्रोतों पर भी असर पड़ सकता है।”

2009 से नहीं हुए वायु गुणवत्ता मानकों में संशोधन

रमेश ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय दावा कर रहा है कि देश में सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर अभी भी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों के भीतर है, लेकिन यह मानक वर्ष 2009 के हैं। उस समय प्रदूषण का स्तर काफी कम था और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के स्वास्थ्य पर प्रभाव की जानकारी सीमित थी।

उन्होंने कहा कि जब तक इन मानकों को अद्यतन नहीं किया जाता, तब तक सरकार का आकलन और नीति दोनों ही भ्रमित करने वाले रहेंगे।

सरकार ने क्यों दी ढील?

11 जुलाई को जारी अधिसूचना में पर्यावरण मंत्रालय ने थर्मल पावर प्लांट्स के लिए सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानकों की समयसीमा बढ़ा दी है।

कैटेगरी A (एनसीआर या एक मिलियन से ज्यादा आबादी वाले शहरों के 10 किमी भीतर के प्लांट्स) को 2024 से बढ़ाकर 2027 कर दिया गया है।

कैटेगरी B (गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों या नॉन-अटेनमेंट शहरों के 10 किमी दायरे में आने वाले प्लांट्स) को केस दर केस आधार पर आकलन करने का फैसला लिया गया है।

कैटेगरी C (बाकी सभी प्लांट्स) को FGD से पूरी तरह से छूट दे दी गई है, यदि वे 2029 तक निर्धारित चिमनी ऊंचाई मानदंड पूरा करते हैं।

इसमें कहा गया है कि कोविड महामारी, सप्लाई चेन की दिक्कतें, तकनीकी उपलब्धता, उपभोक्ताओं पर बिजली दरों के बोझ जैसी चुनौतियों के चलते छूट दी गई है।

क्या है FGD तकनीक?

FGD यानी Flue Gas Desulphurisation एक प्रणाली है जो थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड को फिल्टर कर देती है। भारत ने 2015 में सख्त सल्फर डाइऑक्साइड मानक लागू किए थे और दो साल में इन्हें लागू करना अनिवार्य किया था।

लेकिन अब तक लगभग 92 प्रतिशत थर्मल पावर प्लांट्स ने FGD यूनिट नहीं लगाई है। इससे भारत के वायु प्रदूषण स्तर में तेजी से वृद्धि हुई है और यह विश्व स्तर पर चिंता का विषय बन चुका है।

सरकार द्वारा सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानकों में दी गई छूट ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण की नीतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जयराम रमेश जैसे विशेषज्ञों की चिंता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी है। ऐसे में यह जरूरी है कि भारत जल्द से जल्द NAAQS जैसे मानकों को अपडेट करे और PM2.5 जैसे खतरनाक प्रदूषकों की अनदेखी बंद करे, वरना प्रदूषण की कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।

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