नई दिल्ली। लोकसभा में मंगलवार को एंटी पेपर लीक बिल पर हुई चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव देखने को मिला। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार को शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य को लेकर घेरते हुए कई गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने में नाकाम रही है और इसका खामियाजा लाखों युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। वहीं केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए आपातकाल का मुद्दा उठाया। इसके बाद सदन में दोनों नेताओं के बीच कई विषयों पर तीखी बहस छिड़ गई।
'नाराज युवा किसी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं'
बहस में हिस्सा लेते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार को युवाओं की नाराजगी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उनका कहना था कि यदि युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठ गया तो भविष्य में यही असंतोष सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी देश की प्रगति उसकी मजबूत शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है, इसलिए सरकार को शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर अधिक गंभीरता दिखानी चाहिए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब वर्ष 2024 में पेपर लीक रोकने के लिए कानून बनाया जा चुका था, तो फिर अब संशोधन या नया विधेयक लाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। उनके अनुसार यदि पहले का कानून प्रभावी होता तो बार-बार पेपर लीक की घटनाएं सामने नहीं आतीं।
रिजिजू ने आपातकाल का जिक्र कर विपक्ष पर साधा निशाना
अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलनों के बाद कानून बनाना बेहतर विकल्प है, बजाय इसके कि विरोध को दबाने के लिए आपातकाल जैसे कदम उठाए जाएं। उनके इस बयान के बाद सदन का माहौल और अधिक गरमा गया तथा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई।
रिजिजू की टिप्पणी को लेकर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी और बहस का केंद्र शिक्षा से निकलकर राजनीतिक इतिहास तक पहुंच गया।
'दिल्ली के हालात भी किसी इमरजेंसी से कम नहीं थे'
केंद्रीय मंत्री की टिप्पणी का जवाब देते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि उन्होंने ऐतिहासिक आपातकाल नहीं देखा, लेकिन हाल के दिनों में दिल्ली में जो परिस्थितियां बनीं, वे भी किसी आपातकाल जैसी प्रतीत हुईं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे लोगों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कई स्थानों पर सड़कों को इस तरह बंद किया गया कि लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई।
उन्होंने कहा कि अगर सरकार बार-बार इमरजेंसी की बात करती है तो उसे यह भी याद रखना चाहिए कि उसके बाद देश की जनता ने सत्ता परिवर्तन का फैसला लिया था। उन्होंने दावा किया कि जनता भविष्य में भी अपना फैसला लोकतांत्रिक तरीके से सुनाएगी।
शिक्षा व्यवस्था और स्कूल बंद होने का मुद्दा भी उठाया
अखिलेश यादव ने सरकार पर शिक्षा क्षेत्र की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्राथमिक शिक्षा सबसे मजबूत नींव होती है, लेकिन सरकार की नीतियों के कारण बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देशभर में एक लाख से अधिक प्राथमिक विद्यालय बंद हो चुके हैं और उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल है।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले जहां देश में सात लाख से अधिक स्कूल थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर करीब छह लाख रह गई है। साथ ही माध्यमिक विद्यालयों के बंद होने और शिक्षक भर्ती से जुड़े विवादों का भी उल्लेख करते हुए उन्होंने 69 हजार शिक्षक भर्ती मामले में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया। उनका कहना था कि इन फैसलों का सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्ग के युवाओं पर पड़ा है।
पेपर लीक और NEET परीक्षा पर सरकार को घेरा
सपा प्रमुख ने अपने संबोधन में बोर्ड परीक्षाओं और नीट परीक्षा में सामने आए कथित पेपर लीक मामलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाली ऐसी घटनाओं से प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है और लाखों छात्रों की मेहनत पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उन्होंने उन छात्रों के प्रति संवेदना भी व्यक्त की, जिन्होंने कथित तौर पर परीक्षा संबंधी तनाव के बीच अपनी जान गंवाई। साथ ही उन्होंने प्रभावित परिवारों को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने की मांग दोहराई और कहा कि युवाओं के भविष्य की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी होनी चाहिए।
मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी का भी किया उल्लेख
अपने भाषण के अंतिम हिस्से में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में नई सरकारी यूनिवर्सिटियों की स्थापना की गति संतोषजनक नहीं रही, जबकि पहले से मौजूद कुछ संस्थानों को भी पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा और विकास के बजाय राजनीतिक मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। उनके अनुसार इसका सबसे अधिक नुकसान युवाओं, विद्यार्थियों और गरीब परिवारों के बच्चों को उठाना पड़ रहा है। वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए लगातार आवश्यक सुधार कर रही है।













