नीट पेपर लीक मुद्दे को लेकर देशभर में चर्चा में आए कॉकरोच जनता पार्टी के अध्यक्ष अभिजीत दीपके को लेकर उनके पिता ने एक भावुक किस्सा साझा किया है। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान जब वह बेटे की चिंता में बार-बार फोन करते थे, तो अभिजीत ने उनसे कहा, "अब मैं सिर्फ आपका बेटा नहीं हूं, पूरे देश का बच्चा हूं। इसलिए मुझे बार-बार फोन मत किया करो।" पिता के मुताबिक, बेटे की यह बात सुनकर उन्हें उसकी जिम्मेदारी और सोच का एहसास हुआ।
अभिजीत दीपके के पिता भगवानराव दीपके, जो महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) में इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, ने बताया कि अभिजीत अक्सर उनसे कहता था कि जंतर-मंतर पर देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग उसके समर्थन में पहुंच रहे थे। वहां मौजूद लोग उसकी हर जरूरत का ध्यान रख रहे थे, खाना-पानी उपलब्ध करा रहे थे और उसे परिवार जैसा स्नेह दे रहे थे। अभिजीत का कहना था कि जो लोग आंदोलन में उसके साथ खड़े हैं, वे भी उसके माता-पिता और भाई-बहनों की तरह ही हैं।
अमेरिका से लौटने के बाद कम समय में बनाई अलग पहचान
अभिजीत दीपके को अमेरिका से भारत लौटे अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना ली। विशेष रूप से नीट पेपर लीक मामले को लेकर शुरू किए गए आंदोलन के बाद उनका नाम लगातार सुर्खियों में बना रहा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इस आंदोलन की चर्चा और तेज हो गई।
शुरुआत में जंतर-मंतर पर आंदोलन में लोगों की संख्या सीमित थी, लेकिन समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। खासकर सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाए जाने और 20 जुलाई को आयोजित 'चलो संसद' मार्च के बाद बड़ी संख्या में छात्र, युवा और अन्य लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए।
'राजनीति पसंद नहीं, लेकिन बेटे के फैसले के साथ हूं'
भगवानराव दीपके ने कहा कि उन्हें राजनीति में विशेष रुचि नहीं है। उन्होंने बताया कि अभिजीत ने उनकी इच्छा के विपरीत इस आंदोलन की शुरुआत की थी, जिसके कारण परिवार स्वाभाविक रूप से चिंतित था। बेटे के सामाजिक और जनसरोकारों से जुड़े कार्यों में सक्रिय होने से उन्हें लगातार उसकी सुरक्षा की चिंता बनी रहती थी।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देकर बड़े दिल का परिचय दिया है। उनके अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम को किसी की जीत या हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि अभिजीत करीब दो वर्षों तक अरविंद केजरीवाल के साथ काम कर चुके हैं, जहां उन्हें राजनीति और जनआंदोलनों को नजदीक से समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा, "मुझे राजनीति पसंद नहीं है, लेकिन मेरा बेटा जो भी फैसला करेगा, मैं हमेशा उसके साथ खड़ा रहूंगा।"
आंदोलन के दौरान पूरा परिवार रहा तनाव में
कुछ दिन पहले अभिजीत दीपके के माता-पिता ने भी बेटे के आंदोलन की सफलता पर अपनी खुशी जाहिर की थी। उनका कहना था कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उन्हें लगा कि आंदोलन का उद्देश्य पूरा हुआ है। हालांकि इस पूरे दौर में परिवार लगातार मानसिक दबाव और चिंता के माहौल में रहा।
अभिजीत की मां ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि बेटे की मेहनत रंग लाई और यह उनके लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनकी आंखों में खुशी के आंसू हैं, क्योंकि पिछले करीब ढाई महीने से पूरा परिवार बेटे की सुरक्षा और आंदोलन को लेकर गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहा था। अब आंदोलन के सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद परिवार ने कुछ राहत की सांस ली है।
मां ने बयां किया आंदोलन के दिनों का दर्द
अभिजीत दीपके की मां ने बताया कि आंदोलन के दौरान उनका बेटा कई रातों तक ठीक से सो भी नहीं पाता था। सिर्फ अभिजीत ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार लगातार तनाव और चिंता में जी रहा था। उन्होंने कहा कि दिन-रात चल रहे आंदोलन और लगातार बदलते घटनाक्रम के कारण घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। रातों को नींद नहीं आती थी और हर समय बेटे की सुरक्षा की चिंता सताती रहती थी। अब जब आंदोलन का सकारात्मक परिणाम सामने आया है, तो उन्हें इस बात की खुशी है कि बेटे की मेहनत सफल हुई। उन्होंने कहा कि जिस साहस और दृढ़ता के साथ अभिजीत अपने फैसले पर डटा रहा, उस पर उन्हें गर्व है।
उन्होंने आगे बताया कि आंदोलन के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उनकी चिंता और बढ़ा दी। अभिजीत के साथ धक्का-मुक्की हुई, उसे थप्पड़ मारे गए और उस पर स्याही भी फेंकी गई। इन घटनाओं के बाद वह हर पल यही सोचती रहती थीं कि आगे उसके साथ क्या होगा। उन्होंने कहा कि कई रातें ऐसी रहीं, जब वह सुबह तीन-चार बजे तक जागती रहती थीं। न ठीक से भोजन कर पाती थीं और न ही चैन की नींद ले पाती थीं। उनका कहना था कि 7 जून से घर में किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था और पूरा परिवार सिर्फ अभिजीत की चिंता में डूबा हुआ था।
हर सुबह फोन उठाने से लगता था डर
परिजनों ने बताया कि आंदोलन के दौरान हर सुबह मोबाइल की घंटी बजते ही मन घबरा जाता था। उन्हें डर रहता था कि कहीं कोई बुरी खबर न मिल जाए। अभिजीत की मां ने कहा कि वह अक्सर उसके दोस्तों से संपर्क कर बेटे की कुशलक्षेम पूछती थीं। दोस्त उन्हें भरोसा दिलाते थे कि सभी लोग अभिजीत के साथ मजबूती से खड़े हैं और उसकी पूरी देखभाल कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अब उनकी सिर्फ यही इच्छा है कि अभिजीत जल्द से जल्द सुरक्षित घर लौट आए। उन्होंने भावुक होकर कहा कि जब बेटा घर आएगा तो सबसे पहले उसे गले लगाऊंगी। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी छात्रों और लोगों की जीत है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस आंदोलन का समर्थन किया और उसे सफल बनाने में योगदान दिया।
परिवार ने की थी विशेष सुरक्षा की मांग
इसी बीच अभिजीत दीपके के परिवार ने यह भी बताया कि आंदोलन के दौरान उन्हें उसके जीवन को लेकर गंभीर आशंका बनी हुई थी। उनका कहना था कि उन्हें दिल्ली पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर पूरा भरोसा नहीं था। इसी कारण अभिजीत की बहन स्नेहा वंजारे ने बीड जिला कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर अभिजीत के लिए विशेष सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की थी।
स्नेहा वंजारे ने बताया कि परिवार की सबसे बड़ी चिंता अभिजीत की सुरक्षा थी। उन्होंने कहा कि कई बार फोन करने के बावजूद अभिजीत किसी का कॉल नहीं उठा पा रहे थे, जिससे परिवार की बेचैनी और बढ़ गई थी। इसी स्थिति को देखते हुए उन्होंने बीड जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति को पत्र भेजा और मांग की कि आंदोलन के दौरान अभिजीत को विशेष सुरक्षा मुहैया कराई जाए, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।













