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नीतीश कैबिनेट में वंशवाद का दबदबा, 10 मंत्री परिवारिक राजनीतिक विरासत के सहारे सत्ता में

नीतीश कैबिनेट में परिवारवाद की गूंज एक बार फिर साफ दिखाई दी, जहां 26 में से 10 मंत्री राजनीतिक घरानों से आते हैं। सम्राट चौधरी, विजय चौधरी, अशोक चौधरी, संतोष सुमन, श्रेयसी सिंह जैसे नेताओं ने अपने पिता, पति या परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है। जानें किस तरह बिहार की नई एनडीए सरकार में वंशवाद की मजबूत मौजूदगी नजर आती है।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Thu, 20 Nov 2025 7:12:34

नीतीश कैबिनेट में वंशवाद का दबदबा, 10 मंत्री परिवारिक राजनीतिक विरासत के सहारे सत्ता में

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में गठित नई एनडीए सरकार में परिवारवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शपथ ग्रहण समारोह में शामिल 26 मंत्रियों में से 10 मंत्री ऐसे हैं, जिनकी राह उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि ने सहज बनाई है। कोई पिता की स्थापित राजनीतिक जमीन पर कदम बढ़ा रहा है, तो कोई पति या परिवार की विरासत को आगे ले जा रहा है। इन नामों में बीजेपी, जेडीयू, हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) और आरएलएम के नेता शामिल हैं। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी से लेकर श्रेयसी सिंह और संतोष सुमन जैसे चेहरे इसी सूची में आते हैं।

सम्राट चौधरी – पिता की राजनीतिक पहचान का विस्तार

नीतीश सरकार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहे हैं, और उनकी पृष्ठभूमि पूरी तरह राजनीतिक है। उनके पिता शकुनी चौधरी कांग्रेस, समता पार्टी और आरजेडी से कई बार विधायक चुने गए और राबड़ी देवी सरकार में मंत्री भी रहे। सम्राट खुद भी पूर्व में आरजेडी के साथ रहे और राबड़ी सरकार में मंत्री बने। तारापुर विधानसभा सीट से जहां से वे विजेता बने, वहां उनके पिता छह बार चुनाव जीत चुके हैं।

विजय कुमार चौधरी – विरासत में मिली जेडीयू की मज़बूती

जेडीयू के वरिष्ठ नेता व मंत्री विजय कुमार चौधरी की राजनीतिक यात्रा भी विरासत का परिणाम है। उनके पिता जगदीश प्रसाद चौधरी कांग्रेस के प्रमुख चेहरे थे और दलसिंहसराय सीट से तीन बार विधायक बने। पिता के निधन के बाद विजय चौधरी ने उपचुनाव जीतकर राजनीति में प्रवेश किया और बाद में जेडीयू का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

अशोक चौधरी – कांग्रेस से जेडीयू तक का सफर

अशोक चौधरी भी उन नेताओं में हैं जिनका राजनीतिक आधार परिवार से ही तैयार हुआ। उनके पिता महावीर चौधरी कांग्रेस के दिग्गज नेता थे और बिहार सरकार में मंत्री रहे। अशोक ने भी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की और प्रदेश अध्यक्ष रहे। बाद में वे जेडीयू में शामिल हुए। उनकी बेटी शांभवी भी राजनीति में सक्रिय हैं और समस्तीपुर से लोजपा (रामविलास) की सांसद हैं।

संतोष सुमन – मांझी परिवार का प्रभाव

हम पार्टी के कोटे से मंत्री बने संतोष सुमन, पार्टी के संस्थापक व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के पुत्र हैं। मांझी ने नीतीश कुमार से मतभेद के बाद हम पार्टी बनाई थी, जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष वर्तमान में संतोष ही हैं। मांझी परिवार की राजनीति में कई सदस्य सक्रिय हैं—संतोष की भाभी दीपा और समधन ज्योति कुमारी भी हम से विधायक हैं।

दीपक प्रकाश – उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक उत्तराधिकारी

पहली बार काबिना में शामिल हुए दीपक प्रकाश, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं। उनकी मां स्नेहलता भी सासाराम से विधायक चुनी गई हैं। परिवार की सक्रिय भागीदारी ने दीपक के राजनीतिक सफर को मजबूती दी है।

नितिन नबीन – बांकीपुर सीट पर स्थापित पकड़


बीजेपी नेता नितिन नबीन के पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा पटना पश्चिम क्षेत्र से चार बार विधायक रहे और पार्टी के बड़े नेता थे। परिसीमन के बाद इस सीट का नाम बदलकर बांकीपुर हुआ, जहां से नितिन लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं। यह सीट अब उनकी राजनीतिक पहचान बन चुकी है।

सुनील कुमार – पिता की राजनीतिक छाया में करियर

जेडीयू कोटे से मंत्री बने पूर्व आईपीएस अधिकारी सुनील कुमार के पिता चंद्रिका राम स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ नेता थे। वे भी राज्य सरकार में मंत्री रहे थे। सुनील के राजनीतिक रास्ते में परिवार की छवि ने निश्चित रूप से भूमिका निभाई है।

श्रेयसी सिंह – खेल रिकार्ड के साथ राजनीतिक जड़ें भी मज़बूत


राष्ट्रमंडल खेलों की स्वर्ण पदक विजेता श्रेयसी सिंह को भी इस बार मंत्री पद मिला है, लेकिन राजनीति उनके लिए नई नहीं है। उनके पिता दिग्विजय सिंह केंद्र सरकार में मंत्री रहे, जबकि उनकी मां पुतुल देवी बांका से सांसद चुनी गई थीं। श्रेयसी अपनी पारिवारिक विरासत और व्यक्तिगत उपलब्धियों दोनों के साथ राजनीति में आई हैं।

रमा निषाद – पति और ससुर की राजनीतिक परंपरा

बीजेपी कोटे से चुनी गईं रमा निषाद राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार का हिस्सा हैं। उनके पति अजय निषाद मुजफ्फरपुर से सांसद रह चुके हैं, जबकि ससुर कैप्टन जय नारायण निषाद चार बार सांसद बने और केंद्र में मंत्री भी रहे। परिवार की राजनीतिक पकड़ ने रमा के करियर को मजबूती दी है।

लेशी सिंह – पति की असमय मौत के बाद संभाली जिम्मेदारी

जेडीयू की प्रमुख महिला चेहरों में शामिल लेशी सिंह राजनीति में तब आईं जब उनके पति बूटन सिंह की हत्या हो गई। बूटन सिंह नीतीश कुमार की समता पार्टी के जिलाध्यक्ष थे। उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हुए लेशी सिंह ने न केवल राजनीति में कदम रखा, बल्कि मजबूत नेतृत्व भी दिखाया।

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