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भाजपा-नीतीश की 51 फीसदी वोटों पर दावेदारी, चिराग छिटके तो क्या होगा

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा सत्ता की दिशा तय करते हैं। इस बार भी भाजपा और जेडीयू इन्हीं सामाजिक आधारों पर भरोसा कर रही हैं। दोनों दलों का गठबंधन सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग के उस ठोस वोट बैंक पर टिके रहना चाहता है, जो मिलकर लगभग 51 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है

Posts by : Rajesh Bhagtani | Updated on: Wed, 08 Oct 2025 11:05:19

भाजपा-नीतीश की 51 फीसदी वोटों पर दावेदारी, चिराग छिटके तो क्या होगा

बिहार की राजनीति में हर बार की तरह इस बार भी जातीय समीकरणों का खेल सबसे अहम माना जा रहा है। चुनावी मौसम में मतदाता का रुझान तय करने में सामाजिक वर्गों की भूमिका निर्णायक रहती है। इस बार भी भाजपा और जेडीयू इसी समीकरण पर भरोसा कर मैदान में उतरी हैं। दोनों दलों की रणनीति साफ है—सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग के मजबूत गठजोड़ को साधना। यही वह सामाजिक आधार है, जिसने बीते चुनावों में नीतीश कुमार और भाजपा की सरकार को मजबूती दी थी।

बिहार की कुल आबादी में लगभग 15 फीसदी सवर्ण वर्ग आता है, जिसमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ शामिल हैं। संख्या में कम होने के बावजूद इन जातियों का प्रभाव राज्य की राजनीति में हमेशा गहरा रहा है। यह वर्ग न केवल अपने मतों से बल्कि अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और ओपिनियन लीडर की भूमिका से भी चुनावी माहौल को दिशा देता है। आरजेडी के शासनकाल में भले सवर्णों की राजनीतिक भूमिका कुछ कमजोर दिखी हो, लेकिन भाजपा ने लगातार इन्हें अपने साथ जोड़े रखा। यही कारण है कि यह वर्ग आज भी भाजपा का सबसे विश्वसनीय समर्थन आधार माना जाता है।

दूसरी ओर, नीतीश कुमार का असली जनाधार अति पिछड़ा वर्ग है, जिसकी जनसंख्या लगभग 36 फीसदी के आसपास है। इसमें कुर्मी, कोइरी, कुशवाहा, कश्यप जैसे कई समुदाय शामिल हैं। नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल में पंचायतों में आरक्षण देकर इस वर्ग को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया था। यह रणनीति सफल भी रही और इस वर्ग का बड़ा हिस्सा जेडीयू के साथ स्थायी रूप से जुड़ गया। जब भाजपा के सवर्ण वोट बैंक को नीतीश कुमार के अति पिछड़ा आधार से जोड़ा जाता है, तो यह सामाजिक समीकरण 51 फीसदी के आसपास का मजबूत जनाधार तैयार करता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग के बीच प्रतिद्वंद्विता का अभाव भाजपा-जेडीयू गठबंधन के लिए सबसे बड़ी ताकत है। दोनों समुदाय एक-दूसरे के मतों को स्वीकार करते हैं, जिससे वोट ट्रांसफर सहज रूप से संभव हो जाता है। यही कारण है कि इन दोनों दलों का गठजोड़ बार-बार बिहार की सत्ता तक पहुंचने में सफल रहा है।

अब सवाल यह है कि पासवान समाज, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 5.3 फीसदी हिस्सा है, उसका रुख किस ओर रहेगा। चिराग पासवान इस बार गठबंधन से नाराज बताए जा रहे हैं। उन्होंने लगभग 40 सीटों की मांग की है, जबकि भाजपा 22 से 25 सीटों पर ही सहमत है। अगर चिराग अलग राह चुनते हैं, तो समीकरण में हलचल जरूर हो सकती है, लेकिन भाजपा के रणनीतिकार इस संभावित झटके से चिंतित नहीं दिखते। उनका मानना है कि दलित समाज भी अब एकरूप नहीं रहा और उसका एक बड़ा हिस्सा मोदी और नीतीश के नाम पर वोट देने को तैयार है।

अंततः बिहार का यह चुनाव केवल विकास या भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों की बारीक गणना पर टिका है। भाजपा और नीतीश कुमार का 51 फीसदी सामाजिक आधार फिलहाल मजबूत दिखता है, पर अगर चिराग पासवान ने अपना अलग रास्ता चुना, तो यही समीकरण बिहार की सत्ता की तस्वीर बदल सकता है।


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