
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) में संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने संगठन को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाते हुए दिनारा से विधायक आलोक कुमार सिंह को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। वहीं, प्रशांत पंकज चंद्रवंशी को पार्टी का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इस फैसले को पार्टी में नई ऊर्जा भरने और असंतोष को थामने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
प्रदेश टीम में नई जिम्मेदारियां तय
संगठनात्मक घोषणा के तहत हिमांशु पटेल को पार्टी का प्रधान महासचिव बनाए रखा गया है, जबकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मदन चौधरी को सौंपी गई है। उल्लेखनीय है कि मदन चौधरी अब तक प्रभारी के तौर पर कार्य कर रहे थे, जिन्हें अब औपचारिक रूप से यह पद सौंपा गया है। उपेंद्र कुशवाहा ने साफ किया कि पार्टी का विस्तार उन्हीं नेताओं के जरिए किया जाएगा, जिनके नाम घोषित किए गए हैं। इसके साथ ही पार्टी द्वारा विशेष सदस्यता अभियान चलाने की भी तैयारी की जा रही है।
एक विधायक अब भी नाराज, माधव आनंद को नहीं मिली भूमिका
हालांकि, पार्टी के भीतर सभी असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। उपेंद्र कुशवाहा से नाराज बताए जा रहे तीन विधायकों में से दो ने सुलह कर ली है, लेकिन एक विधायक अभी भी नाराज माना जा रहा है। प्रेस वार्ता में मौजूद रहने के बावजूद विधायक माधव आनंद को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। वहीं, बाजपट्टी से विधायक रामेश्वर महतो प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल ही नहीं हुए, जिससे राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
रामेश्वर महतो की गैरमौजूदगी पर कुशवाहा का जवाब
जब पत्रकारों ने उपेंद्र कुशवाहा से सवाल किया कि प्रेस वार्ता में रामेश्वर महतो क्यों नहीं पहुंचे, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि यह कोई विधायक दल की बैठक नहीं थी। उन्होंने आगे कहा कि अगर इसी आधार पर सवाल उठाया जाएगा, तो एक और विधायक स्नेह लता भी मौजूद नहीं थीं। उल्लेखनीय है कि स्नेह लता उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी हैं और सासाराम विधानसभा सीट से विधायक हैं।
क्या संगठनात्मक बदलाव डैमेज कंट्रोल की रणनीति है?
राष्ट्रीय लोक मोर्चा फिलहाल सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन का हिस्सा है। विधानसभा चुनाव के बाद कैबिनेट गठन के समय पार्टी के कुछ विधायक उपेंद्र कुशवाहा से नाराज हो गए थे। नाराजगी की बड़ी वजह यह रही कि मंत्री पद की शपथ के दौरान उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री पद की शपथ दिलवाई, जबकि वे विधानमंडल के सदस्य नहीं हैं। इसी फैसले के चलते पार्टी के भीतर असंतोष उभरा। ऐसे में मौजूदा संगठनात्मक फेरबदल को पार्टी में टूट रोकने और आंतरिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।













