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कोरोना के दो वैरिएंट से संक्रमित महिला की हुई मौत, जीनोम सीक्वेंसिंग से हुई थी पहचान; जानें इससे जुड़ी हर बात

पहली-हमारे देश में डेल्टा, डेल्टा प्लस, लैम्ब्डा और कप्पा जैसे वैरिएंट एक्टिव हैं और दूसरी- भारत वैरिएंट के प्रकार की जांच करने, यानी जीनोम सीक्वेंसिंग में काफी पिछड़ा हुआ है।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Fri, 16 Jul 2021 9:58:43

कोरोना के दो वैरिएंट से संक्रमित महिला की हुई मौत, जीनोम सीक्वेंसिंग से हुई थी पहचान;  जानें इससे जुड़ी हर बात

बेल्जियम के आल्स्तो शहर के एक अस्पताल में पहुंची एक 90 साल की महिला कोरोना के दो अलग-अलग वैरिएंट से संक्रमित थी। हालाकि, महिला जब अस्पताल पहुंची थी जब उसकी सांस ठीक चल रही थी। ऑक्सीजन लेवल भी 94% से ज्यादा था। बस महिला संतुलन खोकर बार-बार गिर रही थी। जांच में पाया गया कि वह एक नहीं बल्कि कोरोना के दो अलग वैरिएंट यानी दो अलग तरह के कोरोना से संक्रमित निकली। महिला कोरोना के अल्फा और बीटा वैरिएंट से संक्रमित थी। कुछ घंटों बाद ही उसके फेफड़े तेजी से बेकार होने लगे और पांचवें दिन उसकी मौत हो गई। महिला को कोरोना वैक्सीन नहीं लगी थी। आपको बता दे, कोरोना के अलग-अलग वैरिएंट से संक्रमित होने का दुनिया का यह पहला मामला है। एक्सपर्ट्स का कहना था कि डबल इंफेक्शन को लेकर दुनिया को अलर्ट रहने की जरूरत है। भारत के लिए यह केस दो वजहों से बेहद खास है। पहली-हमारे देश में डेल्टा, डेल्टा प्लस, लैम्ब्डा और कप्पा जैसे वैरिएंट एक्टिव हैं और दूसरी- भारत वैरिएंट के प्रकार की जांच करने, यानी जीनोम सीक्वेंसिंग में काफी पिछड़ा हुआ है।

दो अलग-अलग लोगों से हुआ इंफेक्शन

बेल्जियम के इस मामले को भले ही दुनिया का पहला मामला माना जा रहा है, मगर डॉ. ऐनी वेंकीरबर्गेन समेत दूसरे रिसर्चर्स का कहना है कि ब्राजील में इस साल की शुरुआत में ही दो वैरिएंट्स से संक्रमित होने के मामले मिले थे, मगर उन मामलों पर कोई रिसर्च नहीं की गई। यूरोपियन कांग्रेस ऑफ इंफेक्शियस डिजीज में इस मामले पर रिपोर्ट बनाने की अगुआई करने वाली डॉ ऐनी वेंकीरबर्गेन का कहना है कि चूंकि अल्फा और बीटा वैरिएंट बेल्जियम में फैले हुए हैं, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि महिला दो अलग-अलग लोगों से संक्रमित हुई होगी। रिसर्चर्स का कहना है कि अगर कोरोना वायरस के वैरिएंट्स की जांच के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग और बढ़ा दिया जाए तो बेल्जियम जैसे और मामले सामने आ सकते हैं।

इतनी आसानी से नहीं होता 'डबल इन्‍फेक्‍शन'

एक ही शरीर में दो-दो वैरिएंट्स का संक्रमण आम बात नहीं है। यह जरूरी नहीं कि अलग-अलग लोगों से मुलाकात पर संक्रमण हो ही जाए। कोई संक्रमित व्‍यक्ति अपने संपर्क में आने वाले हर व्‍यक्ति को संक्रमण नहीं दे सकता। अधिकतर केसेज में यह पता नहीं चलेगा कि शख्‍स को एक व्‍यक्ति से संक्रमण हुआ है या कई से। क्‍योंकि जीनोम सीक्‍वेंस लगभग एक जैसे ही होते हैं।

आखिर यह जीनोम और जीनोम सीक्वेंसिंग है क्या?

- जीन हमारी जैविक विशेषताओं जैसे हमारा कद, बालों का रंग, हमारी आंखों का रंग जैसी हर बात को तय करते हैं। यानी किसी जीव का पूरा जेनेटिक कोड जीनोम कहलाता है।
- जीनोम किसी जीव को बनाने वाली किताब है, तो जीन उस किताब के चैप्टर।
- किन्हीं भी दो जीवों का जीनोम एक जैसा नहीं हो सकता है। आसान शब्दों में कहें तो जीनोम जैविक दुनिया का पहचान पत्र है।
- इंसान समेत ज्यादातर जीवों का जीनोम DNA वाला होता है, मगर कोरोना जैसे वायरस का जीनोम RNA वाला होता है।
- जीनोम के अध्ययन से किसी भी जीव की बनावट, गुण-दोष और काम करने का तरीका समझा जा सकता है।
- जीनोम को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है। माइक्रोस्कोप से देखने पर भी इसे समझना बेहद मुश्किल होता है, इसलिए वैज्ञानिक इसे एक कोड में बदल देते हैं। यही जीनोम सीक्वेंसिंग है।
- ​​​​​वायरस का जीनोम RNA वाला होता है, इसलिए उसकी सीक्वेंसिंग के लिए पहले DNA में बदला जाता है।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जीनोम सीक्वेंसिंग क्यों जरूरी है?

कोरोना से लड़ाई में जीनोम सीक्वेंसिंग, यानी कोरोना वैरिएंट की पहचान बहुत जरूरी है। हर वायरस का एक जेनेटिक सिक्वेंस होता है, आसान शब्दों में एक फिक्स नंबर या स्ट्रक्चर होता है। जिसे उस वायरस का बेस पेयर कहा जाता है। हम सभी जानते हैं कि जो वायरस सबसे पहले आया था उसे अल्फा, फिर बीटा, गामा, डेल्टा और डेल्टा प्लस है। यहां पर हर वायरस का एक स्ट्रक्चर है, जो लैब में मौजूद है। वेरिएंट की पहचान के लिए वायरस के आरएनए को बढ़ाया जाता है, इसके लिए इसे सिक्वेंसिंग मशीन पर डाला जाता है। इसके लिए आजकल एनएसजी प्लैटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है, क्योंकि यह नेक्स्ट जेनरेशन का है। जब किसी मरीज का सैंपल लिया जाता है तो उसके छोटे से हिस्से को पीसीआर के जरिए बड़ा करके यह पता लगाते हैं कि कोरोना है या नहीं। लेकिन जीनोम सिक्वेंसिंग में आरएनए को बड़ा करके बेस पेयर के स्ट्रक्चर से मिलान किया जाता है।

अगर किसी वायरस का स्ट्रक्चर 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8... है और जब वह अपनी कॉपी बनाता है और उस स्ट्रक्चर में कोई एक अंक गायब है या उसके स्थान पर कोई दूसरा अंक है, जो समझ लिया जाता है कि इस वायरस में बदलाव हो गया है और उसका नंबर यह है। अब अगर लगातार सैंपल की जांच के बाद इसी तरह का स्ट्रक्चर मिलता रहता है तो समझ लिया जाता है कि वायरस में एक नया म्यूटेशन हो गया, जिसका स्ट्रक्चर ऐसा है।

अभी लैब में न्यूट्रलाइजेशन भी किया जा रहा है। इसमें हम यह भी देख सकते हैं कि जो नया वेरिएंट आया है उसे एंटीबॉडी से क्रॉस कराते हैं। इससे यह पता चल जाता है कि नया म्यूटेशन में बीमार करने की कितनी क्षमता है। वैरिएंट की पहचान से यह भी पता चल जाता है कि यह वायरस आया कहां से। जिस तरह कहा जा रहा कि भारत में मिला डेल्टा वैरिएंट अब तक दुनिया के 111 देशों में फैल चुका है।

वायरस का म्यूटेशन क्या है?

जीनोम सिक्वेंसिंग जीन का एक स्ट्रक्चर होता है। लेकिन, जब वायरस रिप्लिकेट करता है तो यह अपनी कॉपी बनाता है। लेकिन, कई बार यह अपनी कॉपी बनाने में गलती कर जाता है और वह पहले वाले की तरह नहीं होता है, उसमें कुछ मिसिंग रह जाता है, जो उसके ऑरिजिनल यानी बेस पेयर से अलग होता है। अपने मूल चरित्र या बेस पेयर अलग होने को ही म्यूटेशन कहा जाता है। डॉक्टर चंद्रकांत ने कहा कि आमतौर पर यह नए रूप में वायरस आने के बाद उसके व्यवहार में बड़ा बदलाव नहीं होता है, इसलिए अधिकतर यह देखा गया है कि म्यूटेशन के बाद भी वायरस ज्यादा खतरनाक नहीं होता है। लेकिन, कोरोना में खासकर डेल्टा और डेल्टा प्लस में देखा जा रहा है कि म्यूटेशन के बाद यह वायरस पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है।

जीनोम सीक्वेंसिंग के बिना बेल्जियम का केस पता ही नहीं चलता

- अगर बेल्जियम वाले केस की जीनोम सीक्वेंसिंग नहीं होती तो यह पता नहीं चलता कि कोई शख्स दो वैरिएंट से भी इंफेक्टेड हो सकता है।
- इसी आधार पर अब साइंटिस्ट्स यह पता लगाने में जुट गए हैं कि कहीं इससे कोरोना ज्यादा संक्रामक तो नहीं हो जाता या इससे मौत की आशंका तो नहीं बढ़ जाती है।

भारत में 10 जीनोम सिक्वेंसिंग लैब

भारत में अभी 10 जीनोम सिक्वेंसिंग लैब हैं। दिल्ली में ऐसे दो लैब हैं, एनसीडीसी और आईजीआईबी। Indian SARS CoV-2 consortium on Genomics (INSACOG) के अनुसार आने वाले दिनों में देश में 18 और लैब को इससे जोड़ा जा रहा है। इसमें से दो लैब और दिल्ली में होंगे, जिसमें एक एम्स और दूसरा आईएलबीएस है। इससे पहले दिल्ली में एनसीडीसी और आईजीआईबी में सैंपल की जीनोम टेस्टिंग की जा रही है। जीनोम सिक्वेंसिंग के लिए अभी तक पूरे देश में 45 हजार सैंपल लिए गए हैं, जिसमें 36,630 सैंपल की जांच हुई।

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